Bhagavad Gītā · Chapter 18 · Mokṣa Sannyāsa Yoga
निश्चयं श्रृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः
॥ १८.४ ॥
niścayaṃ śrṛṇu me tatra tyāge bharatasattama|tyāgo hi puruṣavyāghra trividhaḥ saṃprakīrtitaḥ||
Word meanings
भरतसत्तम = O best of the Bharatas
तत्र = in that regard
त्यागे = on the subject of tyāga
मे = my
निश्चयम् = the conclusion
शृणु = hear
हि = for
पुरुषव्याघ्र = O tiger among men
त्यागः = tyāga
त्रिविधः = threefold
सम्प्रकीर्तितः = has been declared
Translation
Of Samnyasa and Tyaga, first hear My conclusion on the subject of Tyaga, Arjuna; for Tyaga, O tiger among men, has been declared y to be of three kinds—Sattvika Rajasika and Tamasika
Commentary
The commentators seated around this verse

Rāmānuja · Viśiṣṭādvaita
English
Madhvācārya · Dvaita
SanskritEnglish“तत्प्रकारं चाऽह - निश्चयम् इत्यादिना ||” those methods are explained as certain.

Jñāneśvar · Vārkarī
English4 *'My decision as regards that relinquishment do thou hear, O Best of the Bharata (clan). Relinquishment, O Tiger amongst men, is pronounced to be of three kinds.* (145)
Now, relinquishment, Oh Son of Pāṇḍu, is three-fold, and I now preach to you the different signs of the triad. Even though there are the three kinds of relinquishment, the gist of all is only this, which bear well in mind. I am the All-knowing, and you first hear, what according to my intellect, is the definite and firm essence. The seeker who wishes to be ever alert in regard to his deliverance, should wholly conduct himself realizing fully this essence of relinquishment.
Swami Ramsukhdas · Modern
English'Niścayam śrṇu me tatra tyāge bharatasattama'—Lord Kṛṣṇa asks Arjuna to hear from Him, His view on relinquishment, first.
'Tyāgo hi puruṣavyāghra trividhaḥ samprakīrtitaḥ'—The Lord addressing Arjuna, as the best of men, says that relinquishment has been declared to be of three kinds—sāttvika (good), rājasika (passionate) and tāmasika (ignorant). According to the Lord, the sāttvika relinquishment, is real relinquishment. But, in order to show the superiority of sāttvika relinquishment, He has mentioned the passionate and the ignorant forms, of relinquishment, also.
In discussing the threefold relinquishment He wants to convey, that a striver should adopt only sāttvika, relinquishment, by giving up the rājasika and the tāmasika, ones.

Ādi Śaṅkarācārya · Advaita
Sanskritनिश्चयं शृणु अवधारय मे मम वचनात्; तत्र त्यागे त्यागसंन्यासविकल्पे यथादर्शिते भरतसत्तम भरतानां साधुतम । त्यागो हि, त्यागसंन्यासशब्दवाच्यो हि यः अर्थः सः एक एवेति अभिप्रेत्य आह - त्यागो हि इति । पुरुषव्याघ्र, त्रिविधः त्रिप्रकारः तामसादिप्रकारैः संप्रकीर्तितः शास्त्रेषु सम्यक् कथितः यस्मात् तामसादिभेदेन त्यागसंन्यासशब्दवाच्यः अर्थः अधिकृतस्य कर्मिणः अनात्मज्ञस्य त्रिविधः संभवति, न परमार्थदर्शिनः, इत्ययमर्थः दुर्ज्ञानः, तस्मात् अत्र तत्त्वं न अन्यः वक्तुं समर्थः । तस्मात् निश्चयं परमार्थशास्त्रार्थविषयं अध्यवसायं ऐश्वरं मे मत्तः शृणु ॥
कः पुनः असौ निश्चयः इति, आह -

Ādi Śaṅkarācārya · Advaita
Hindiहे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठतम अर्जुन! उस पूर्वदर्शित त्यागके विषयमें, अर्थात् त्याग-संन्याससम्बन्धी विकल्पोंके विषयमें तू मेरा निश्चय सुन, अर्थात् मेरे वचनोंसे कहा हुआ तत्त्व भली प्रकार समझ।
त्याग और संन्यास शब्दका जो वाच्यार्थ है वह एक ही है, इस अभिप्रायसे केवल त्यागके नामसे ही (प्रश्नका) उत्तर देते हैं। हे पुरुषसिंह! (उस) त्यागका शास्त्रोंमें तामस आदि तीन प्रकारके भेदोंसे भली प्रकार निरूपण किया गया है।
जिससे कि आत्मज्ञानरहित कर्माधिकारी— कर्मी पुरुषका ही ‘त्याग-संन्यास-शब्दका वाच्यार्थ (संन्यास) तामस आदि भेदोंसे तीन प्रकारका होना सम्भव है, परमार्थज्ञानी नहीं’ यह अभिप्राय समझमें आना बड़ा कठिन है, इसलिये इस विषयमें
यथार्थं तत्त्वं बतलानेको दूसरा कोई समर्थ नहीं है, अतः तू मुझ ईश्वरका शास्त्रोंके यथार्थ अभिप्रायसे युक्त निश्चय सुन

Jñāneśvar · Vārkarī
Marathiतरी त्यागु एथें पांडवा । त्रिविधु पैं जाणावा । तया त्रिविधाही बरवा । विभाग करूं ॥ १४५ ॥ त्यागाचे तीन्ही प्रकार । कीजती जरी गोचर । तरी तूं इत्यर्थाचें सार । इतुलें जाण ॥ १४६ ॥ मज सर्वज्ञाचिये बुद्धी । जें अलोट माने त्रिशुद्धी । निश्चयतत्व तें आधीं । अवधारीं पां ॥ १४७ ॥ तरी आपुलिये सोडवणें । जो मुमुक्षु जागों म्हणे । तया सर्वस्वें करणें । हेंचि एक ॥ १४८ ॥

Jñāneśvar · Vārkarī
Hindi(18.145) हे पाण्डव! संसार में त्याग तीन प्रकार का है। वे तीनों प्रकार हम जुदे-जुदे वर्णन करते हैं।
(18.146) परन्तु यद्यपि हम त्याग के तीन प्रकारों का वर्णन करेंगे तथापि उन सबका तात्पर्य और निष्कर्ष थोड़ा-सा ही है।
(18.147) अतः मुझ सर्वज्ञ की बुद्धि का भी जो निश्चय से ग्राह्य जान पड़ता है वह निश्चयतत्त्व पहले सुन ले।
(18.148) अपनी मुक्ति पाने के लिए जो मुमुक्षु जागृत रहना चाहता है उसे चाहिए कि हम जो बताते हैं वही एक बात, हर तरह से, करे।

Sri Udiya Baba · Modern
Hindiसंगति— यहाँ तक अन्य आचार्यों के मत बतलाकर अब भगवान् अपना मत बतलाते हैं—
भावार्थ— हे भरतश्रेष्ठ! अब त्याग के विषय में तुम मेरा निश्चय सुनो। हे पुरुषसिंह! त्याग भी तीन प्रकार का कहा गया है।
व्याख्या— यहाँ भगवान् ने अर्जुन को 'भरतसत्तम' इसलिए कहा कि ब्रह्मविद्या प्रायः लुप्त हो चुकी थी। भरतकुल में भी उस समय कोई ब्रह्मवेत्ता नहीं था। वह तत्त्वज्ञान अर्जुन प्राप्त करना चाहता है, इसलिए वह भरतकुल में सर्वश्रेष्ठ है। इसी प्रकार 'पुरुषव्याघ्र' सम्बोधन भी इसीलिए प्रयुक्त हुआ है, क्योंकि अर्जुन सिंह के समान निर्भय है और जो निर्भय होता है वही ब्रह्मविद्या प्राप्त कर सकता है।
प्रश्न— तत्त्ववेत्ता का क्या लक्षण है?
उत्तर— ज्ञान के कुछ लक्षण तो इस श्लोक द्वारा पहले बतलाये जा चुके हैं—
अक्रोधवैराग्यजितेन्द्रियत्वं क्षमादयासर्वजनप्रियत्वम् । निलोभदानं भयशोकहानं ज्ञानस्य चिह्नं दशलक्षणानि ॥
इनके सिवा जो क्षमावान् हो, आत्मचिन्तन में तत्पर हो, अमानी और निर्भय हो तथा सुख-दुःख में समान रहे और मानापमान में अविचल हो वह भी ज्ञानी है। वह क्षमावान् इसलिए होता है, क्योंकि शरीर से असंग होता है। आत्मा के सिवा किसी की सत्ता ही नहीं है, अतः और किसका चिन्तन करे। शरीर को वह स्वयं घृणित समझता है, इसलिए उसे मानापमान का कोई ध्यान नहीं होता। जब सब अपने ही स्वरूप हैं तो वह भय किससे करे। शरीर से उसका सम्बन्ध नहीं रहता, इसलिए वह सुख-दुःख में समान रहता है। वह सम्पूर्ण मत-मतान्तर, प्रवृत्ति-निवृत्ति, ज्ञानी-अज्ञानी, और प्रेमी-अप्रेमियों को आकाश-कुसुमवत् देखता है, इसलिए सभी से उदासीन रहता है। ये सब लक्षण भी केवल संकेत मात्र हैं। वास्तव में तो तत्त्ववेत्ता का कोई लक्षण नहीं होता। अथवा सब संसार उसी का स्वरूप है, इसलिए सब उसी की महिमा है। ज्ञान तो स्वसंवेद्य है। यदि उसका कोई लक्षण हो तो वह परसंवेद्य हो जायगा। द्रष्टा को दृश्य और रज्जु को सर्प कैसे जानेगा।
Swami Ramsukhdas · Modern
Hindi[ इस श्लोकके पूर्वार्धकी व्याख्याके रूपमें भगवान्ने पाँचवें और छठे श्लोकमें अपना मत बताया है और उत्तरार्धकी व्याख्याके रूपमें सातवेंसे नवें श्लोकतक तीन प्रकारके त्यागका वर्णन किया है।
जिस प्रकार शरीर और शरीरिका विवेक सभी योगियोंके लिये परम आवश्यक होनेके कारण भगवान्ने उसका वर्णन गीतामें सबसे पहले (दूसरे अध्यायके ग्यारहवेंसे तीसवें श्लोकतक) किया है, उसी प्रकार फलकी कामना और कर्मकी आसक्तिका त्याग सभी योगियोंके लिये अत्यन्त आवश्यक होनेके कारण यहाँ भगवान् 'त्याग' का वर्णन सबसे पहले आरम्भ करते हैं।]
'निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम'—हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! अब मैं संन्यास और
त्याग—दोनोंमेंसे पहले त्यागके विषयमें अपना मत कहता हूँ, उसको तुम सुनो।
'त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः'—हे पुरुषव्याघ्र! त्याग तीन तरहका कहा गया है—सात्त्विक, राजस और तामस। वास्तवमें भगवान्के मतमें सात्त्विक त्याग ही 'त्याग' है; परन्तु उसके साथ राजस और तामस त्यागका भी वर्णन करनेका तात्पर्य यह है कि उनके बिना भगवान्के अभीष्ट सात्त्विक त्यागकी श्रेष्ठता स्पष्ट नहीं होती; क्योंकि परीक्षा या तुलना करके किसी भी वस्तुकी श्रेष्ठता सिद्ध करनेके लिये दूसरी वस्तुएँ सामने रखनी ही पड़ती हैं।
तीन प्रकारका त्याग बतानेका तात्पर्य यह भी है कि साधक सात्त्विक त्यागको ग्रहण करे और राजस तथा तामस त्यागका त्याग करे।
It is logically explained that even in the performance of prescribed Vedic activities and obligatory duties one can exercise tyāga or renunciation in its threefold composite. Abandonment of these is not required.
First is the lowest stage likened unto tama guṇa, the mode of ignorance whereby in renunciation one performs activities as a matter of duty or a matter of righteousness without desire for rewards. This can be done by abandoning desires for material benefits or heavenly delights.
Second is the intermediate stage likened unto raja guṇa the mode of passion whereby renunciation of activities abandons the identifying ego sense attached to it. Relinquishing such mentalities as this work was accomplished by me, I did it, this is mine and the rewards are mine.
Thirdly is likened unto sattva guṇa the mode of goodness and is renunciation whereby one surrenders all rewards and results unto the Supreme Lord Krishna or any of His authorised incarnations and expansions as revealed in Vedic scriptures.
One should be cognizant that He is the supreme absolute truth, the supreme controller and the ultimate reality and not think that we are the controllers in any way.