Bhagavad Gītā · Chapter 6 · Dhyāna Yoga
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः
॥ ६.२४ ॥
saṅkalpaprabhavānkāmāṃstyaktvā sarvānaśeṣataḥ|
manasaivendriyagrāmaṃ viniyamya samantataḥ||
Word meanings
सङ्कल्पप्रभवान् = arising from intention
अशेषतः = completely
सर्वान् = all
त्यक्त्वा = having given up/risking
कामान् = desires
मनसा = with the mind
एव = indeed
इन्द्रियग्रामम् = the whole group of senses
समन्ततः = from all sides
विनियम्य = restraining
Translation
Completely renouncing all desires arising from thoughts of the world, and fully re straining the whole pack of the senses from all sides by the time
Commentary
The commentators seated around this verse

Rāmānuja · Viśiṣṭādvaita
EnglishOn verses 6.24–25

Madhvācārya · Dvaita
SanskritEnglishOn verses 6.24–6.25
“सर्वान् सर्व विषयान् | अशेषतः एकविषयोऽपि कामः स्वल्पः कादाचित्कोऽपि न कर्तव्यं इत्यर्थः | मनसैव नियन्तु शक्यते नान्येन इति एव शब्दः || युद्धे कणटवं मनोनिगहे आत्मरमणे च || - सर्वान् means all the things, अशेषतः means without leaving any traces (of desires). मनसैव means by the mind alone it is possible to restrain, not otherwise. Intellect is the instrument for restraining the mind as well as for pleasures.

Jñāneśvar · Vārkarī
English24 "Renouncing without residue all longings that have their root in cherished aims withdrawing from everywhere the aggregate of sense-centres by (the effort of) one's own mind: (375) The study of 'Yoga,' which you consider to be difficult, is a simple thing in one way. Only passion and wrath which are the progeny of ego's fancy must first be crushed to death, and the ego's fancy made to lament the loss of its entire progeny. If the fancy hears the news of the destruction of the sense-objects, and if it sees the senses brought completely under control, it will break its heart and it will commit suicide. When the mind attains such apathy towards worldly life, there will be the end of the fancy's pilgrimage and then alone the Soul's vision could dwell in great happiness in the mansion of fortitude.
Swami Ramsukhdas · Modern
English[The state, which is attained by disinterested action (6/1—9), is attained by meditation on God with attributes and form (6/14-15), as by meditation on the self (6/18—23), is also attained by meditation on the Absolute, Who is formless and attributeless, which is described here.]
'Saṅkalpaprabhavānkāmāṁstyaktvā sarvānaśeṣataḥ'—Thoughts of worldly things, persons and incidents etc., come to the mind, when the man is either attached to or hateful for these and, it becomes a 'Saṅkalpa' (pursuit of the mind). This seed of pursuit, sprouts and grows into a plant of desire. It should happen and it should not happen—this is desire. Thus desire born of thought, should be completely abandoned.
The term 'Kāmān' (desires), which is itself plural, yet to emphasize that all the desires of different kinds, should be abandoned another term 'Sarvān' has also been given here.
'Aśeṣataḥ' means, that the seed of desires should be completely destroyed, otherwise it may sprout and grow into a forest of desires stretching for miles and miles.
'Manasaivendriyagrāmaṁ viniyamya samantataḥ'—Objects of five senses—sound, touch, colour, taste and smell, should be fully restrained by the mind. 'Samantataḥ' means, that the mind also should not think of sensual pleasures, and in the mind there should not be any temptation for worldly praise, honour and comfort etc., in the least. One, who practises meditation should resolve, to renounce affinity for all material objects.
**Appendix**—First there is 'Sphuraṇā' (mere flash of thought) and then it is changed into 'Saṅkalpa' (pursuit of the mind). When we take 'Sphuraṇā' as existent and get attached to it and further we insist on its implementation then it changes into a 'Saṅkalpa'. 'Sphuraṇā' is like the glass of a mirror in which no photograph of a man is taken but 'Saṅkalpa' is like the film of a camera which immediately catches the impression.
*Link:—In the next verse, Lord Kṛṣṇa explains what should be done, to give up all desires and to restrain the senses.*

Ādi Śaṅkarācārya · Advaita
Sanskritसङ्कल्पप्रभवान् सङ्कल्पः प्रभवः येषां कामानां ते सङ्कल्पप्रभवाः कामाः तान् त्यक्त्वा परित्यज्य सर्वान् अशेषतः निर्लेपेन । किञ्च, मनसैव विवेकयुक्तेन इन्द्रियग्रामं इन्द्रियसमुदायं विनियम्य नियमनं कृत्वा समन्ततः समन्तात् ॥

Ādi Śaṅkarācārya · Advaita
Hindiसंकल्पसे उत्पन्न हुई समस्त कामनाओंको निःशेषतासे अर्थात् लेशमात्र भी शेष न रखते हुए निर्लेपभावसे छोड़कर, एवं विवेकयुक्त मनसे इन्द्रियोंके समुदायको सब ओरसे रोककर अर्थात् उनका संयम करके

Jñāneśvar · Vārkarī
Marathiतरि तोचि योगु बापा । एके परि आहे सोपा । जरी पुत्रशोकु संकल्पा । दाखविजे ॥ ३७५ ॥
हा विषयातें निमालिया आइके । इंद्रियें नेमाचिया धारणीं देखे । तरी हियें घालूनि मुके । जीवितांसी ॥ ३७६ ॥
ऐसें वैराग्य हें करी । तरी संकल्पाची सरे वारी । सुखें धृतीचिया धवळारीं । बुद्धी नांदे ॥ ३७७ ॥

Jñāneśvar · Vārkarī
Hindi(6.375) अब हे तात! इस योग का एक सुलभ मार्ग यह है कि संकल्प को पुत्रशोक ही अर्थात् संकल्प के पुत्र काम-क्रोधों का नाश किया जाय।
(6.376) संकल्प जो विषयों का लीन होना सुन ले, अथवा इन्द्रियों को निगृहीत स्थिति में देख ले, तो हृदय फाड़ कर अपने जीवन का नाश कर लेता है।
(6.377) यदि इस प्रकार वैराग्य प्राप्त करोगे तो संकल्प का आवागमन बन्द हो जावेगा और धैर्य के मन्दिर में बुद्धि सुख से निवास करेगी।

Sri Udiya Baba · Modern
HindiOn verses 6.24–6.25
संगति— यहाँ तक सांख्ययोग के अभ्यास का प्रसङ्ग था। सांख्य में तो विवेक होने पर ही पूर्णता मानी गयी है। परन्तु वास्तव में यह स्थिति योग से पहले की है। अर्थात् यह जिज्ञासु का अभ्यास है। अब २४ से ३२ वें श्लोक तक बोधवान् के अभ्यास का प्रसङ्ग है। २३ वें श्लोक तक योग-समाधि बतलायी गयी, अब २४ वें और २५ वें श्लोक में ज्ञान-समाधि बतायेंगे। पहले निरोध समाधि का उल्लेख किया था, उसी का अब प्रकारान्तर से वर्णन करते हैं। आगे के तीन श्लोक अद्वैत-वेदान्तनिष्ठा के हैं—
भावार्थ— संकल्प से उत्पन्न हुई समस्त कामनाओं को सर्वथा त्यागकर मन से ही इन्द्रियों को सब ओर से रोककर धैर्ययुक्त बुद्धि से मन को धीरे-धीरे विषयों से हटावे तथा उसे आत्मा में लगाकर फिर कुछ भी चिन्तन न करे।
व्याख्या— चौरासी लाख योनियों में जो अनेक प्रकार के भोग भोगे हैं उनके संस्कार चित्त में अंकित रहते हैं और समय-समय पर प्रकट होते रहते हैं। जैसे श्री शंकराचार्यजी ने आठ वर्ष की आयु में ही अपनी माताजी से कहा था कि मैं संन्यास लूँगा। यहाँ 'सर्वान्' शब्द से प्रकृति के कार्यों का त्याग और 'अशेषतः' से प्रकृति सहित सम्पूर्ण कार्यों का त्याग समझना चाहिये। साथ ही मोक्ष-सम्बन्धी शास्त्रों के अध्ययन की इच्छा का त्याग, मैं प्रतिष्ठित कुल में उत्पन्न हुआ हूँ इस अभिमान का त्याग, इसी प्रकार इहलोक-परलोक के सभी सुख और अष्टसिद्धियों को भी त्यागकर केवल सच्चिदानन्द में ही चित्त की स्थिति रखे। फिर पूर्णानन्द की उपलब्धि होने पर आनन्द को भी त्याग दे। साधु और तीर्थों के दर्शन और शास्त्रश्रवणादि की भी इच्छा न रहे। यही इन्द्रियों को उनके विषयों से रोकना है।
प्रश्न— जब 'सर्वान्' कह दिया तो 'अशेषतः' क्यों कहा? क्या एक विशेषण पर्याप्त नहीं था?
उत्तर— निर्विकल्प समाधि होने पर सब कामनाएँ तो जिज्ञासु की भी शान्त हो जाती हैं, किन्तु निःशेष अर्थात् उनकी पूर्णतया निवृत्ति बोधवान् की ही होती है क्योंकि फिर उनकी सत्ता ही नहीं रहती। अथवा 'सर्वान्' से ब्रह्मलोकपर्यन्त सम्पूर्ण लोकों का त्याग और 'अशेषतः' से विराट्, हिरण्यगर्भ और ईश्वर इन लोकाधिपतियों का त्याग समझें।
इन श्लोकों में भगवान् ने यह दिखलाया है कि मन से सब को हटा दिया, अब मन को भी हटाओ। शनैः शनैः हटावे जिससे आलस्य न घेर ले, क्योंकि आरम्भ में कोई भी आलम्बन न रहने पर चित्त को आलस्य घेर लेगा। प्राण रुकने पर मन समाहित होता है और उसमें आनन्द का आविर्भाव होता है। यह सविकल्प समाधि है। उस आनन्द को प्राप्त होते ही न त्याग दे। उसका पूर्ण विकास होने दे, जिससे कि निद्रा और आलस्यादि का आक्रमण न हो। जब आनन्द का इतना विकास हो जाय कि पलक खोलना और मूँदना भी भारी जान पड़े तब उससे भी असंग हो जाय। यही आनन्द से उपराम होना है। अधिक समय हो जाने पर भी साधन को छोड़े नहीं, डटा ही रहे तथा आगे वाले विघ्नों से बचा रहे। आनन्दमय कोश को त्यागना बहुत कठिन है इसके लिये बड़े धैर्य की आवश्यकता है। यदि आनन्द को होते ही त्याग देगा तो लय-विक्षेप आदि विघ्न आ जायेंगे। अतः जब पूर्ण सत्त्वगुण बढ़ जाय तभी आनन्द से असंग होने का प्रयत्न करें।
प्रश्न— समाधि के अभ्यास में कौन-कौन विघ्न आते हैं। उनके क्या कारण हैं और उनसे किस प्रकार बचा जा सकता है?
उत्तर— समाधि के मुख्यतया चार विघ्न हैं—लय, विक्षेप, कषाय और रसास्वाद। लय दोष अधिक भोजन करने, व्यर्थ विवाद करने, अधिक सोने, अधिक जागने अथवा नशा करने से होता है। इसमें मूढ़ावस्था आ जाती है और अकर्मण्यता घेर लेती है; न इष्ट
का ध्यान रहता है न अपना अनुसंधान तथा न सोता है न जागता है। यही लय दोष है। विशेष का कारण असत्य वस्तु में सत्यत्व-बुद्धि और उसमें आसक्ति है। इसमें चित्त का उच्चाटन हो जाता है तथा आगे-पीछे की बातें याद आने लगती हैं। कषाय या शून्यता का कारण अपने चित्त का मोह है। अनेकों जन्मों का अभ्यास होने के कारण मन को भोगों से हटाने पर दुःख होता है। उस समय उस मोहवश उस पर दया करने से ही कषाय दोष आता है। इस अवस्था में राग-द्वेष का चिन्तन होने लगता है और चित्त शून्य-सा हो जाता है। यह स्थिति बड़ी सूक्ष्म है, इससे भली प्रकार सावधान रहना चाहिये। रसास्वादन—इसका कारण अल्प-सुख में ही फँस जाना है तथा उतने से ही अपने को कृतकृत्य मान लेना है। इसमें जो सुख जान पड़े उसमें फँसे नहीं।
उपर्युक्त विघ्नों से बचने के उपाय ये हैं—
लये सम्बोधयेच्छितं विक्षिप्तं शमयेत्पुनः। सकषायं विजानीयात् शमप्राप्तं न चालयेत्॥ नास्वादयेत्सुखं तत्र निःसंगः प्रज्ञया भवेत्। निश्चलं निश्चरच्चित्तमेकी कुयत्प्रयत्नतः॥
अर्थात् जब लय दोष उपस्थित हो तो चित्त को सचेत करें। उच्च स्वर से जप करें, टहलने लगे या हाथ-मुँह धोले। विशेष उपस्थित हो तो चित्त को शान्त करें, इष्टाकार वृत्ति करें। कषाय उपस्थित हो तो उसे भले प्रकार जानने का प्रयत्न करें। इन विघ्नों के निवृत्त होने पर जब साम्यावस्था प्राप्त हो तो उसे विचलित न करें। उस समय चित्त एकाग्र होने से एक विलक्षण आनन्द प्राप्त होगा। उसी को रसास्वाद कहते हैं। उसका जब पूर्ण विकास हो जाय तो उससे असंग हो जाय, उसका आस्वादन न करें। इस प्रकार चित्त को प्रयत्नपूर्वक निश्चल और एकाग्र करें।
प्रश्न— २५ वें श्लोक में कहा गया है कि “न किञ्चदपि चिन्तयेत्” अर्थात् कुछ भी चिन्तन न करें। इससे तो जड़वाद सिद्ध होता है।
उत्तर— इसके साथ “आत्मसंस्थं मनः त्वा” भी तो कहा है; यदि कुछ भी चिन्तन न करे— इसके साथ आत्मसंस्थिति न होती तो जड़वाद सिद्ध हो सकता था। संकल्प की उत्पत्ति शून्य से होती है और शून्य जड़ है अतः संकल्प भी जड़ है इसलिए यहाँ जड़ संकल्प से उपराम होकर चित्त को आत्मस्थिति करने के लिए कहा है।
प्रश्न— क्या यह सम्भव है कि कुछ भी चिन्तन न किया जाय? क्या संसार में कोई बिना काम किये भी रह सकता है?
उत्तर— क्यों नहीं रह सकता? क्रिया—शरीर, वाणी और मन तीन के द्वारा होती है। इनमें आसन के द्वारा शरीर की क्रिया निवृत्त हो जाती है, प्राणायाम से वाणी की तथा धारणा ध्यान और समाधि से मन की क्रिया शान्त हो जाती है। धरणा, ध्यान और समाधि एक ही है। धारणा प्रारम्भिक अवस्था है, उससे ऊँचा ध्यान है और समाधि सबसे ऊँची अवस्था है। हमारे यहाँ सबसे ऊँचा वही माना जाता है जो क्रिया को पूर्णतया शान्त कर देता है। हमारे ऋषि-मुनियों का लक्ष्य क्रिया को शान्त करना ही है। इसीलिये भगवान् ने कुछ भी चिन्तन न करने को कहा है। श्रीमद्भागवत में प्रह्लादजी का कथन है—
तस्मादर्थाश्च कामाश्च धर्माश्च यदुपाश्रयाः। भजतानीहयात्मानमनीहं हरिमीश्वरम्॥
अर्थात् अर्थ, धर्म और काम जिनके आश्रित हैं उन अनीह (चेष्टाहीन) आत्मा श्रीहरि का अनीहा (चेष्टाहीनता) के द्वारा भजन करो। योगवासि में भी कहा है—
ऊर्ध्वबाहुर्विरौम्येष न च कश्चिच्छृणोति मे। असंकल्पः परं श्रेयः स किमर्थं न भाव्यते॥
मैं भुजा उठाकर कहता हूँ, किन्तु मेरी बात कोई नहीं सुनता— संकल्प न करना ही परम कल्याण है। यही भावना क्यों नहीं करते?
संकल्पमात्रकलनैव जगत् समग्रं संकल्पमात्रकलनैव मनोविलासः।
संकल्पमात्रमतिमुत्सृज निर्विकल्प—
माश्रित्य निश्चयमवाप्नुहि राम शान्तिम्॥
यह सम्पूर्ण जगत् संकल्पमात्र है। मनोविलास भी संकल्प की ही कल्पना है। अतः संकल्प को ही त्यागकर निर्विकल्प निश्चय का आश्रय लो और हे राम! शान्ति प्राप्त कर लो। अथवा—
न किञ्चिच्चिन्तयेद्योगी सदा शून्यपरो भवेत्।
न किञ्चिच्चिन्तनादेव परमात्मा प्रकाश्यते॥
योगी कुछ भी चिन्तन न करे। सर्वदा शून्यपरायण रहे। कुछ चिन्तन न करने से ही परमात्मा प्रकाशित हो जाता है। “शून्यपरः का अर्थ शून्यात् परः” शून्य से भी परे अर्थात् शून्य का साक्षी भी होता है। तद्रूप होकर रहे। हमारे यहाँ तो जो कुछ नहीं करता वही बड़ा आदमी माना जाता है।
प्रश्न— भूत-भविष्य का चिन्तन न हो, वर्तमान में ही स्थित रहे—इस पर इतना जोर क्यों दिया है?
उत्तर— भूत-भविष्यत् ही संसार है, वर्तमान ही द्रष्टा है। इसलिए भूत-भविष्यत् का चिन्तन छोड़कर वर्तमान में स्थित रहना चाहिये। यही सबसे बड़ा अभ्यास है। यह अथवा संकल्प-साक्षी रूप से स्थित रहना एक ही बात है। संकल्पों का साक्षी रहने से संकल्प देखते-देखते उड़ जायेंगे। केवल वर्तमान ही रह जायगा। वर्तमान में स्थिति का नाम ही ब्रह्माकार वृत्ति है। कबीर साहब ने भी कहा है—
मन थिर तन थिर प्रान थिर सुरति-निरति थिर होय।
कह कबीर ता पलक की कल्प न पावै कोय॥
तन, मन और प्राण—इन तीनों में से किसी एक की क्रिया रुक जाय तो शेष दो की भी रुक जाती है। केवल शरीर की क्रिया बन्द हो जाने पर भी मन और प्राण की क्रिया स्वयं रुक जाती है।
प्रश्न— शरीर की क्रिया किस प्रकार रुकेगी?
उत्तर— पहले आसन को स्थिर जमाकर सुखपूर्वक बैठना चाहिये। यह ध्यान रखे कि शरीर और पलक हिलें नहीं। केवल आसन
की स्थिरता बढ़ाता जाय, और कुछ भी न करे। मन के सामने आगे-पीछे की बातें न आने दे, वर्तमान में ही स्थित रहे।
प्रश्न— इससे क्या होगा?
उत्तर— इस अभ्यास के बढ़ाने से आकाशगमन, दूरदर्शिता, अणिमादि अष्टसिद्धियाँ तथा शास्त्रों का तात्पर्य जानने की योग्यता हो जाती है। पहले हमारे ऋषि-मुनि यही अभ्यास करते थे। वह शक्ति न रहने पर ही इन जप आदि का आविष्कार हुआ है। ये सब ध्यान के ही साधन हैं। जो पुरुष सत्संग पाठ और जप आदि तो करता है, परन्तु ध्यान नहीं करता, उसका वह साधन विशेष उपयोगी नहीं है। कालान्तर में उसका फल अवश्य मिलेगा। जैसे श्री रामायणजी का पाठ करने वाला व्यक्ति यदि रामभक्त न हो तो भी पाठ करते-करते वह कभी रामभक्त हो ही जायगा। जिस प्रकार हमें निरन्तर जप करने से जप का अभ्यास हो जाता है वैसे ही हमें कुछ भी चिन्तन न करें—इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए उत्साह नहीं छोड़ना चाहिये।
प्रश्न— जो निरन्तर विषय-चिन्तन करता है वह आत्मचिन्तन कैसे करेगा?
उत्तर— विषयों में सत्यत्व, रमणीयत्व और सुखबुद्धि होने से ही उनका चिन्तन होता है। यदि धीरे-धीरे आत्माकार वृत्ति बढ़ाई जायगी तो विषयों का सत्यत्व निवृत्त हो जायगा और फिर आत्मचिन्तन भी होने लगेगा।
Swami Ramsukhdas · Modern
Hindi[जो स्थिति कर्मफलका त्याग करनेवाले कर्मयोगीकी होती है (छठे अध्यायके पहलेसे नवें श्लोकतक), वही स्थिति सगुण-साकार भगवान्का ध्यान करनेवालेकी (छठे अध्यायका चौदहवाँ-पन्द्रहवाँ श्लोक) तथा अपने स्वरूपका ध्यान करनेवाले ध्यानयोगीकी भी होती है (छठे अध्यायके अठारहवेंसे तेईसवें श्लोकतक)। अब निर्गुण-निराकारका ध्यान करनेवालेकी भी वही स्थिति होती है—यह बतानेके लिये भगवान् आगेका प्रकरण कहते हैं।]
'सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः'—सांसारिक वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ, देश, काल, घटना, परिस्थिति आदिको लेकर मनमें जो तरह-तरहकी स्फुरणाएँ होती हैं, उन स्फुरणाओंमेंसे जिस स्फुरणामें प्रियता, सुन्दरता और आवश्यकता दीखती है, वह स्फुरणा 'संकल्प' का रूप धारण कर लेती है। ऐसे ही जिस स्फुरणामें 'ये वस्तु, व्यक्ति आदि बड़े खराब हैं, ये हमारे उपयोगी नहीं हैं'—ऐसा विपरीत भाव पैदा हो जाता है,
वह स्फुरणा भी 'संकल्प' बन जाती है। संकल्पसे 'ऐसा होना चाहिये और ऐसा नहीं चाहिये'—यह 'कामना' उत्पन्न होती है। इस प्रकार संकल्पसे उत्पन्न होनेवाली कामनाओंका सर्वथा त्याग कर देना चाहिये।
यहाँ 'कामान्' पद बहुवचनमें आया है, फिर भी इसके साथ 'सर्वान्' पद देनेका तात्पर्य है कि कोई भी और किसी भी तरहकी कामना नहीं रहनी चाहिये।
'अशेषतः' पदका तात्पर्य है कि कामनाका बीज (सूक्ष्म संस्कार) भी नहीं रहना चाहिये। कारण कि वृक्षके एक बीजसे ही मीलोतकका जंगल पैदा हो सकता है। अतः बीजरूप कामनाका भी त्याग होना चाहिये।
'मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः'—जिन इन्द्रियोंसे शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—इन विषयोंका अनुभव होता है, भोग होता है, उन इन्द्रियोंके समूहका मनके द्वारा अच्छी तरहसे नियमन कर ले अर्थात् मनसे इन्द्रियोंको उनके अपने-अपने विषयोंसे हटा ले।
‘समन्ततः’ कहनेका तात्पर्य है कि मनसे शब्द, स्पर्श आदि विषयोंका चिन्तन न हो और सांसारिक मान, बड़ाई, आराम आदिकी तरफ किंचिन्मात्र भी खिंचाव न हो।
**परिशिष्ट भाव**—पहले स्फुरणा होती है, फिर संकल्प होता है। स्फुरणामें सत्ता, आसक्ति और आग्रह होनेसे वह संकल्प हो जाता है, जो बन्धनकारक होता है। संकल्पसे फिर कामना उत्पन्न होती है। ‘स्फुरणा’ दर्पणके काँचकी तरह है, जिसमें चित्र पकड़ा नहीं जाता। परन्तु ‘संकल्प’ कैमरेके काँचकी तरह है, जिसमें चित्र पकड़ा जाता है। साधकको सावधानी रखनी चाहिये कि स्फुरणा तो हो, पर संकल्प न हो।
*सम्बन्ध*—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग एवं इन्द्रियोंका निग्रह करनेके निश्चयकी बात कही। अब कामनाओंका त्याग और इन्द्रियोंका निग्रह कैसे करें—इसका उपाय आगेके श्लोकमें बताते हैं।
Desires are of a two-fold nature:
Sparsa-ja, which arise from the impulses of the physical body and sankalpa-ja, which arise from the impulses of the mind or mental origin.
Sparsa-ja includes desires for cold or for hot, or for sweet or for salty, or the lack of such. Sankalpa-ja includes desires for wealth, fame, dominion, progeny and such.
With great effort it is possible to abandon the desires of the mind by avoiding thinking about them. It is also possible to resist the sensations of pleasure and pain with an attitude of indifference;
but between the two the desires of the mind are more easy to abandon because it is not possible to avert the sensations of the body.
Thus it is necessary to comprehensively and systematically neutralise the senses from their external corresponding sense objects. This should be undertaken gradually by degrees with determination and a resolute will.
Then in due course of time the mind will be weaned from all things except the eternal ātma or soul and absorbed exclusively in the ātma, one thinks of nothing else.
This is the meaning Lord Krishna intended.