गीताGitaDeep

Bhagavad Gītā · Chapter 6 · Dhyāna Yoga

समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः

संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्

६.१३

samaṃ kāyaśirogrīvaṃ dhārayannacalaṃ sthiraḥ|

saṃprekṣya nāsikāgraṃ svaṃ diśaścānavalokayan||

Recitation coming soon

Translation

Holding the trunk, head and neck straight and steady, remaining firm and fixing the Y/ gaze on the tip of his nose, without looking in other direction

Commentary

The commentators seated around this verse

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Portrait of Rāmānuja

Rāmānuja · Viśiṣṭādvaita

English

On verses 6.13–14

The word saman means straight this denotes that the back, neck and body should be erect and balanced in a straight posture. By sitting with legs crossed in the lotus position or half lotus position assists in keeping this straight position.

The word sthiraḥ means firm this denotes that the seat while being comfortable should not be overly soft.

The eyes should not be allowed to flit hither and thither in different directions on objects near or far but should fix their focus either on the tip of the nose or on the space between the eyebrows.

That was the discipline for the body, now Lord Krishna gives the discipline for the mind:

The mind being tranquil connotes contentment along with freedom from all fears.

The compound word brahmacāri vrate means total celibacy and is an indispensable component insuring the containment and preservation of the vital energy of the physical body which is so essential for development.

Keeping the mind attentive and fixed internally one should meditate on the Supreme Lord.

Portrait of Madhvācārya

Madhvācārya · Dvaita

SanskritEnglish

On verses 6.12–6.14

“योगम् समाधियोगम् युज्ज्यात् ||” - For the sake of equanimity, meditation should be undertaken.

Portrait of Jñāneśvar

Jñāneśvar · Vārkarī

English

13 “There, having steadied himself, and holding the body, the head, and the neck evenly in a line, motionless, with the gaze fixed upon the tip of one’s nose and not looking in the (different) directions. (201)

Then both the palms automatically rest on the left foot forming a bowl (द्रोण), and the shoulders appear to get raised. The head gets sunken between the two raised shoulders and the eyes automatically get half-shut. The upper eyelids get closed while the lower ones get widened, with the result that the eyes remain half-open. The vision partly inside (closed) and partly outside (open) gets directed to and obstructed at the tip of the nose. The vision thus getting handicapped for want of free scope to get out has to steady itself on the tip of the nose in a partially widened condition. It loses all its desires to fix the gaze in any quarter, or to look at some form or shape. The neck gets contracted, while the chin lowers down and fills the pit formed by the collar bones, and while the neck getting stiff presses against the chest. The windpipe (कंठनळी) gets shrouded and the wheel (physical posture) that gets formed in this way is called “Jālandhara.” Then rises up the navel while the stomach gets flat and the heart expands in the interior. The “Bandha” (Yogic posture) formed above the anus and below navel is called ओढीयान (Uddiyan). While these Bandhas and Mudras appear on the exterior of the body as the signs of practice of the Yoga study, the mind’s functions (working) inwardly, are uprooted from their basis.

Swami Ramsukhdas · Modern

English

'Samaṁ kāyaśirogrīvaṁ dhārayannacalaṁ'—The portion of the body from the neck to waist, is called 'Kāya' (trunk), while the portion from neck to top is called, head. All postures are useful, from meditation and health point of view. Out of those postures, Lord Kṛṣṇa has taken the essential feature, necessary for meditation, i.e., to keep neck, back and head in a straight position. While meditating, the trunk, head and neck should be held straight, so that the spinal cord may remain vertical. In this posture, the mind becomes calm and concentrated quickly. If one bends forward, he feels drowsy, if he bends backward, there is stupor and if he bends sideways, he becomes capricious. If he feels drowsy, he should walk a little, and then again with a firm determination, should repractise meditation by holding the trunk, head and neck straight.

'Diśāścānavalokayan'—He should not look in any direction, because by looking here and there, the neck will bend, which will disturb his meditation. So the neck should be held straight.

'Samprekṣya nāsikāgraṁ svaṁ'—He should look at the tip of his nose, with his half-closed eyes. If he closes his eyes, he

may feel sleepy. But if the eyes are open, he is likely to look at the other objects within sight and so there may be distraction in meditation. Thus, Lord Kṛṣṇa means to say, that he should keep his eyes half-closed, because by doing so, the eye-balls assume steadiness and seem as if they are looking at the tip of the nose.

'Sthiraḥ'—He should sit steady, without any activity of the body or senses, just like a statue continuously for three hours. Moreover, there should not be any activity of the mind also. By doing so, he will overcome the strain of the posture and will become 'Titāsana' (conqueror of the posture).

Appendix—Here gazing at the tip of the nose is not important but concentration of the mind is important.

Link:—Blissful meditation (Yoga) on God, (endowed with attributes and form) and the good flowing out of it, have been explained, in the next two verses.

Portrait of Ādi Śaṅkarācārya

Ādi Śaṅkarācārya · Advaita

Sanskrit

समं कायशिरोग्रीवं कायश्च शिरश्च ग्रीवा च कायशिरोग्रीवं तत् समं धारयन् अचलं च । समं धारयतः चलनं सम्भवति ; अतः विशिनष्टि -- अचलमिति । स्थिरः स्थिरो भूत्वा इत्यर्थः । स्वं नासिकाग्रं सम्प्रेक्ष्य सम्यक् प्रेक्षणं दर्शनं कृत्वेव इति । इवशब्दो लुप्तो द्रष्टव्यः । न हि स्वनासिकाग्रसम्प्रेक्षणमिह विधित्सितम् । किं तर्हि ? चक्षुषो दृष्टिसन्निपातः । स च अन्तःकरणसमाधानापेक्षो विवक्षितः । स्वनासिकाग्रसम्प्रेक्षणमेव चेत् विवक्षितम्, मनः तत्रैव समाधीयेत, नात्मनि । आत्मनि हि मनसः समाधानं वक्ष्यति ``आत्मसंस्थं मनः कृत्वा'' (भ. गी. ६-२५) इति । तस्मात् इवशब्दलोपेन अक्ष्णोः दृष्टिसन्निपात एव ``सम्प्रेक्ष्य'' इत्युच्यते । दिशश्च अनवलोकयन् दिशां च अवलोकनमन्तराकुर्वन् इत्येतत् ॥ किञ्च --

Portrait of Ādi Śaṅkarācārya

Ādi Śaṅkarācārya · Advaita

Hindi

बाह्य आसनका वर्णन किया, अब शरीरको कैसे रखना चाहिये? सो कहते हैं—

काया, सिर और गरदनको सम और अचल भावसे धारण करके स्थिर होकर बैठे। समानभावसे धारण किये हुए कायादिका भी चलन होना सम्भव है, इसलिये 'अचलम्' यह विशेषण दिया गया है।

तथा अपनी नासिकाके अग्रभागको देखता हुआ यानी मानो वह उधर ही अच्छी तरह देख रहा है। इस प्रकार दृष्टि करके।

यहाँ 'संप्रेक्ष्य' के साथ 'इव' शब्द लुप्त समझना चाहिये; क्योंकि यहाँ अपनी नासिकाके अग्रभागको देखनेका विधान करना अभिमत नहीं है।

तो क्या है? बस, नेत्रोंकी दृष्टिको (विषयोंकी ओरसे रोककर) वहाँ स्थापन करना ही इष्ट है।

वह (इस तरह दृष्टिस्थापना करना) भी अन्तःकरणके समाधानके लिये आवश्यक होनेके कारण भी अभीष्ट है। क्योंकि यदि अपनी नासिकाके अग्रभागको देखना ही विधेय माना जाय तो फिर मन वहीं स्थित होगा, आत्मामें नहीं।

परंतु (आगे चलकर) 'आत्मसंस्थं मनः कृत्वा' इस पदसे आत्मामें ही मनको स्थित करना बतलायेंगे। इसलिये 'इव' शब्दके लोपद्वारा नेत्रोंकी दृष्टिको नासिकाके अग्रभागपर लगाना ही 'सम्प्रेक्ष्य' इस पदसे कहा गया।

इस प्रकार (नेत्रोंकी दृष्टिको नासिकाके अग्रभाग- पर लगाकर) तथा अन्य दिशाओंको न देखता हुआ अर्थात् बीच-बीचमें दिशाओंकी ओर दृष्टि न डालता हुआ

Portrait of Jñāneśvar

Jñāneśvar · Vārkarī

Marathi

तंव करसंपुट आपैसें । वाम चरणीं बैसे । तंव बाहुमुळीं दिसे । थोरवी आली ॥ २०१ ॥

माजी उभारलेनि दंडें । शिरकमळ होय गाढें । नेत्रद्वारीची कवाडें । लागूं पहाती ॥ २०२ ॥

वरचिलें पाती ढळती । तळींची तळीं पुंजाळती । तेथ अर्धोन्मीलित स्थिती | उपजे तया ॥ २०३ ॥

दिठी राहोनि आंतुलीकडे । बाहेर पाऊल घाली कोडें । ते ठायीं ठावो पडे । नासाग्रपीठीं ॥ २०४ ॥

ऐसें आंतुच्या आंतुचि रचे । बाहेरी मागुतें न वचे । म्हणौनि राहणें आधिये दिठीचें । तेथेंचि होय ॥ २०५ ॥

आतां दिशांचि भेटी घ्यावी । कां रुपाची वाट पहावी । हे चाड सरे आघवी । आपैसया ॥ २०६ ॥

मग कंठनाळ आटे । हनुवटी हे हडौति दाटे । ते गाढी होऊनि नेहटे । वक्षःस्थळीं ॥ २०७ ॥

माजीं घंटिका लोपे । वरी बंधु जो आरोपे । तो जालंधरु म्हणिपे । पंडुकुमरा ॥ २०८ ॥

नाभीवरी पोखे । उदर हें थोके । अंतरीं फांके । हृदयकोशु ॥ २०९ ॥

स्वाधिष्ठानावरिचिले कांठीं । नाभीस्थानातळवटीं । बंधु पडे किरीटी । वोढियाणा तो ॥ २१० ॥

Portrait of Jñāneśvar

Jñāneśvar · Vārkarī

Hindi

(6.201) हाथ द्रोणाकार किये हुए सहज ही बायें पाँव पर रहते हैं और बाहुमूल फूले हुए दिखाई देते हैं।

(6.202) बीच में शरीरदण्ड स्थिर रहने के कारण शिरकमल भीतर घुसा हुआ मालूम होता है तथा नेत्रद्वार के किवाड़रूपी पलक बन्द होते से दिखते हैं। (6.203) ऊपर की बिन्नियाँ नहीं हिलती तथा नीचे स्थिर बनी रहती है जिससे नेत्रों की अर्द्धोन्मीलित स्थिति हो जाती है।

(6.204) दृष्टि भीतर की ओर रहते हुए कुतूहल से बाहर पग डालती है, और नासाग्र तक आई हुई दिखाई देती है;

(6.205) तथा भीतर की दृष्टि भीतर ही रह कर बाहर नहीं निकलती इसलिए उस अर्द्धदृष्टि का निवास नासाग्र पर स्थिर हो जाता है।

(6.206) तब दिशाओं की भेंट लेना अथवा रूप देखने की बाट जोहना इत्यादि इच्छाएँ आप ही आप बन्द हो जाती हैं।

(6.207) कण्ठ सूखने लगता है। ठोड़ी कण्ठ के नीचे के गड्ढे में जम जाती है और हृदय को जोर से दबाती है,

(6.208) और बीच में कण्ठमणि अदृश्य हो जाती है। इस प्रकार जो बन्ध बनता है उसे जालन्धर कहते हैं।

(6.209) नाभि ऊपर उठ आती है, पेट भीतर घुस जाता है और हृदय में हृदयकमल विकसता है।

(6.210) इस प्रकार नाभि के नीचे स्वाधिष्ठान चक्र के ऊपर एक बन्ध बनता है उसे उड्डियान कहते हैं। (6.211) शरीर के बाहरी अंग से जब इस प्रकार अभ्यास किया जाता है।

Portrait of Sri Udiya Baba

Sri Udiya Baba · Modern

Hindi

On verses 6.13–6.14

भावार्थ— शरीर सिर और ग्रीवा को एक-सीध में रखकर उन्हें अचल और स्थिर रखे, अपनी नासिका के अग्र-भाग पर दृष्टि रखे, इधर-उधर न देखे, पूर्णतया शान्त-चित्त और निर्भय रहे तथा ब्रह्मचर्य व्रत में स्थित रहे। इस प्रकार चित्त को निग्रह कर मेरे में चित्त रखकर मेरे परायण हुआ योग में स्थित रहे।

व्याख्या— जिस नासिका की नोक को हम नासिकाग्र समझते हैं वह तो नाक है। अग्रभाग तो दोनों भौहों के बीच में है, जहाँ से नासिका आरम्भ होती है।

प्रश्न— तो क्या नासिकाग्र को ही देखता रहे? यही इष्ट की प्राप्ति है।

उत्तर— यह तो दृष्टि को स्थिर करने के लिये है, जिससे दृष्टि इधर-उधर न जाकर अपने लक्ष्य में लगी रहे।

इस श्लोक से 'अचल' शब्द शरीर के लिये और 'स्थिर' शब्द दृष्टि के लिये प्रयोग किया गया है। अथवा 'अचल' शब्द का प्रयोग आसन के लिये और 'स्थिर' शब्द का प्रयोग शरीर के अंग हाथ-पाँव आदि के लिये समझना चाहिये। यह ध्यान का बहिरंग साधन कहा, अब अन्तरंग साधन बतलाते हैं।

योगी प्रशान्तात्मा—शान्त अन्तःकरण वाला, भय से रहित और ब्रह्मचर्य में स्थित होना चाहिये। मन को सब और से हटा कर मुझमें ही लगा दे। उसमें राग-द्वेष उठते ही नहीं, क्योंकि दृश्य का अत्यन्ताभाव हो चुका है। शान्त तो अन्य पुरुष भी हो सकते हैं, किन्तु प्रशान्त तत्त्ववेत्ता ही होता है। कर्मकाण्ड का भय संन्यास के सिवा और

किसी आश्रम में निवृत्त नहीं होता, अतः संन्यासाश्रम ही निर्भय है। यहाँ जो ब्रह्मचारी के व्रत में स्थित रहने को कहा है वह केवल स्त्री-सहवास त्यागने की दृष्टि से नहीं कहा। यह प्रकरण संन्यासी और योगी का है। स्त्री-सेवन तो संन्यासी करता ही नहीं। केवल भिक्षा के समय ही वह माताओं के सम्पर्क में आता है, अतः संन्यासी के लिए जो पाँच प्रकार की भिक्षा विहित है उसमें से भी चार को छोड़कर केवल माधुकरी का व्रत ले। उसमें जो मिले उसी से उदर-पूर्ति करे। पेट भरने से बचे हुए अन्न को कहीं सुरक्षित स्थान में टाँग दे। या गंगाजी की रेती में गाढ़ दे। दूसरे दिन पहले उस अन्न को ग्रहण करे। अथवा बचे हुए अन्न को रखता जाय। यदि एक दिन का अन्न एकत्रित हो जाय तो उस दिन भिक्षा को न जाकर उसी को काम में लावे।

प्रश्न— ऐसा सुना जाता है कि भिक्षा पाँच या सात घरों से माँगनी चाहिये।

उत्तर— जब तक पेट न भरे माँगता रहे, चाहे सौ घरों में जाना पड़े।

प्रश्न— भजन करने वाले को भोजन दिन में एक बार करना चाहिये या दो बार।

उत्तर— यदि एक बार भोजन करनेसे भजन अच्छा होता है तो एक बार, दो बार करनेसे अच्छा हो तो दो बार और दो दिन में एक बार करने से अच्छा हो तो दो दिन में एक बार करना चाहिये, क्योंकि हमारा लक्ष्य भोजन नहीं भजन है।

अथवा प्रत्येक इन्द्रिय का जो अपने-अपने विषय से सम्बन्ध है वही भोग है। अतः पाँचों इन्द्रियों को जीत लेना ही ब्रह्मचर्य

‘माधुकरमसंकल्पं प्राक्प्रणीतमयाचितम्। तात्कालिकं चोपपन्नं च भैक्ष्यं पञ्चविधं स्मृतम्॥

बिना संकल्प की हुई माधुकरी, प्राक्प्रणीत (निमन्त्राण) अयाचित (अजगरवृत्ति), तात्कालिक (माधुकरी के समय किसी एक घर में ही भिक्षा पा लेना) और उपपन्न (पूर्व सूचना के बिना भिक्षा के समय कुटी पर आया हुआ अन्न)—यह पाँच प्रकार की भिक्षा है।

है। अथवा जो आठों प्रकार के मैथुनों से बचा हुआ है वही ब्रह्मचर्य है। भगवान् मनु ने आठ प्रकार के मैथुन बताये हैं—

दर्शनं स्पर्शनं केलि रहस्यं गृह्यभाषणं। सकल्पोऽध्यवसायश्च क्रियानिर्वृत्तिरेव च॥

अर्थात् स्त्री को देखना, स्पर्श करना, उसके साथ खिलवाड़ करना, हंसी करना, एकान्त में बात करना, मन में संकल्प करना, सहवास का प्रयत्न करना और उसे क्रिया-रूप में परिणत करना।

अथवा जिसकी इहलोक और परलोक दोनों से तथा दोनों के भोगों से घृणा है तथा भगवान् या आत्मा में अनुराग है वही ब्रह्मचारी है। तथा पूर्ण ब्रह्मचारी तो वही है जिसे इहलोक और परलोक आकाश-कुसुम के समान सत्ताशून्य अथवा स्व-स्वरूप ही जान पड़ें। इसका साधन यही है कि निरन्तर भगवदाकार या ब्रह्माकार वृत्ति करता रहे। धीरे-धीरे सभी अनुभव हो जायगा। परन्तु प्रथम साधन तो यही है कि पाँचों इन्द्रियों से असंग हो जाय।

‘मनःसंयम्य’—मैं मन का साक्षी हूँ—ऐसा भाव रखे अर्थात् क्षण-क्षण में आत्माकार वृत्ति करता रहे, क्योंकि ऐसा अभ्यासी अग्निहोत्री को भी पवित्र कर देता है।

‘मत्परः’—मेरे में ही निरन्तर चित्त रखे। ऐसा योग ब्रह्मचर्य की स्थिरता हुए बिना नहीं होता, क्योंकि वायु कुपित होने से रोगादि की आशंका रहती है। इसी से ब्रह्मचर्य व्रत में स्थिर रहने को कहा है।

इन्द्रियों का अपने विषयों के प्रति स्वभाव से ही आकर्षण है। इन्द्रियों का आधार प्राण है। अतः विषयों की आसक्ति से छूटने के लिए प्राण को वश में करना चाहिये और इसके लिये ब्रह्मचर्य व्रत अनिवार्य है।

प्रश्न— सभी शास्त्र कहते हैं कि ब्रह्मचर्य ही पुण्य है तथा ब्रह्मचर्य नष्ट करना ही पाप है। किन्तु पाप तो किसी को दुःख पहुँचाने में है। ब्रह्मचर्य न रखने पर तो स्त्री-पुरुष दोनों ही को सुख होता है। फिर इसमें पाप क्यों माना जाता है?

उत्तर— संसार में सबसे अधिक आसक्ति स्त्री में ही होती है। और किसी भी अन्य वस्तु में आसक्ति रहे तो आत्मा या परमात्मा में अनुराग नहीं हो सकता। इसलिए ब्रह्मचर्य बहुत आवश्यक है।

ये सब गुण होंगे तभी साधक प्रशान्तात्मा हो सकता है।

Swami Ramsukhdas · Modern

Hindi

‘समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलम्’— यद्यपि ‘काय’ नाम शरीरमात्रका है, तथापि यहाँ (आसनपर बैठनेके बाद) कमरसे लेकर गलेतकके भागको ‘काय’ नामसे कहा गया है। ‘शिर’ नाम ऊपरके भागका अर्थात् मस्तिष्कका है और ‘ग्रीवा’ नाम मस्तिष्क और कायाके बीचके भागका है। ध्यानके समय ये काया, शिर और ग्रीवा सम, सीधे रहें अर्थात् रीढ़की जो हड्डी है, उसकी सब गाँठें सीधे भागमें रहें और उसी सीधे भागमें मस्तक तथा ग्रीवा रहे। तात्पर्य है कि काया, शिर और ग्रीवा— ये तीनों एक सूतमें अचल रहें। कारण कि इन तीनोंके आगे झुकनेसे नींद आती है, पीछे झुकनेसे जड़ता आती है और दायें-बायें झुकनेसे चंचलता आती है। इसलिये न आगे झुके, न पीछे झुके और न दायें-बायें ही झुके। दण्डकी तरह सीधा-सरल बैठा रहे।

सिद्धासन, पद्मासन आदि जितने भी आसन हैं, आरोग्यकी दृष्टिसे वे सभी ध्यानयोगमें सहायक हैं। परन्तु यहाँ भगवान्ने सम्पूर्ण आसनोंकी सार चीज बतायी है— काया, शिर और ग्रीवाको सीधे समतामें रखना। इसलिये भगवान्ने बैठनेके सिद्धासन, पद्मासन आदि किसी भी आसनका नाम नहीं लिया है, किसी भी आसनका आग्रह नहीं रखा है। तात्पर्य है कि चाहे किसी भी आसनसे बैठे, पर काया, शिर और ग्रीवा एक सूतमें ही रहने चाहिये; क्योंकि इनके एक सूतमें रहनेसे मन बहुत जल्दी शान्त और

स्थिर हो जाता है।

आसनपर बैठे हुए कभी नींद सताने लगे, तो उठकर थोड़ी देर इधर-उधर घूम ले। फिर स्थिरतासे बैठ जाय और यह भावना बना ले कि अब मेरेको उठना नहीं है, इधर-उधर झुकना नहीं है। केवल स्थिर और सीधे बैठकर ध्यान करना है।

‘दिशश्चानवलोकयन्’—दस दिशाओंमें कहीं भी देखे नहीं; क्योंकि इधर-उधर देखनेके लिये जब ग्रीवा हिलेगी, तब ध्यान नहीं होगा, विशेष होगा। अतः ग्रीवाको स्थिर रखे।

‘सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वम्’—अपनी नासिकाके अग्रभागको देखता रहे अर्थात् अपने नेत्रोंको अर्धनिमीलित (अधमुद्रे) रखे। कारण कि नेत्र मुँद लेनेसे नींद आनेकी सम्भावना रहती है और नेत्र खुले रखनेसे सामने दृश्य दीखेगा, उसके संस्कार पड़ेंगे तो ध्यानमें विशेष होनेकी सम्भावना रहती है। अतः नासिकाके अग्रभागको देखनेका तात्पर्य अर्धनिमीलित नेत्र रखनेमें ही है।

‘स्थिरः’—आसनपर बैठनेके बाद शरीर, इन्द्रियाँ, मन आदिकी कोई भी और किसी भी प्रकारकी क्रिया न हो, केवल पत्थरकी मूर्तिकी तरह बैठा रहे। इस प्रकार एक आसनसे कम-से-कम तीन घण्टे स्थिर बैठे रहनेका अभ्यास हो जायगा, तो उस आसनपर उसकी विजय हो जायगी अर्थात् वह ‘जितासन’ हो जायगा।

परिशिष्ट भाव—यहाँ नासिकाके अग्रभागको देखना मुख्य नहीं है, प्रत्युत मनको एकाग्र करना मुख्य है।

सम्बन्ध—बिछाने और बैठनेके आसनकी विधि बताकर अब आगेके दो श्लोकोंमें फलसहित सगुण-साकारके ध्यानका प्रकार बताते हैं।

प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।

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