अवधारणाएँ

सब धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जा — इसका सचमुच अर्थ क्या है?

शरणागतिः

śaraṇāgatiḥ

शरण (आश्रय, ओट) और आगति (पास आना) से — शरण में आने की वह गति। गीता का अंतिम निर्देश (18.66) ही इसका अधिकार-पत्र है: सर्वधर्मान् परित्यज्य, मामेकं शरणं व्रज।

यह प्रश्न क्यों उठता है

अर्जुन के यह कहने से ठीक पहले — मेरा मोह नष्ट हो गया — गीता का यही अंतिम उपदेश है; और इसकी सबसे विवादित पंक्ति भी। क्या 'सब धर्मों को छोड़' पिछले सत्रह अध्यायों के सिखाए हर कर्तव्य को रद्द कर देता है? नीचे के टीकाकार ठीक इसी पर बँट जाते हैं, और यह बँटवारा उनके संप्रदायों की सबसे गहरी दरार के साथ-साथ चलता है: अंततः छूटता क्या है — स्वयं कर्म, उसके स्वामी होने का भाव, या केवल फल।

जहाँ गीता बोलती है

भगवद्गीता 18.66श्लोक खोलें

चरम-श्लोक — अंतिम शरण

सर्वधर्मान्परित्यज्य

मामेकं शरणं व्रज

सम्पूर्ण धर्मों को अर्थात् सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझमें त्याग कर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण में आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से…

भगवद्गीता 18.62श्लोक खोलें

समूचे भाव से उन्हीं की शरण में जा

तमेव शरणं गच्छ

सर्वभावेन भारत

हे भारत! तू सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही शरण में जा। उस परमात्मा की कृपा से ही तू परम शान्ति को तथा सनातन परम धाम को प्राप्त होगा।

भगवद्गीता 18.55श्लोक खोलें

भक्ति से वह मुझे जानता है, और प्रवेश पाता है

भक्त्या मामभिजानाति

यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः

उस पर भक्ति के द्वारा वह मुझ परमात्मा को, मैं जो हूँ और जितना हूँ ठीक वैसा-का-वैसा तत्त्व से जान लेता है; तथा उस भक्ति से मुझ को तत्त्व से जानकर तत्काल ही मुझमें…

संक्षेप में

इसका अर्थ अपने कर्तव्य छोड़ देना नहीं है — कृष्ण उसी साँस में युद्ध का आदेश भी देते हैं। अर्थ है एक गहरा बोझ उतार देना: यह मान्यता कि सब कुछ आप ही थामे हुए हैं। शंकराचार्य इस श्लोक में सुनते हैं कि आप समस्त कर्म छोड़कर आत्मा में स्थित हो जाएँ; रामानुज, कि आप कर्ता होने का भाव छोड़ दें; मध्व, कि आप फल पर अपना दावा छोड़ दें; ज्ञानेश्वर, कि आप स्वयं अज्ञान को ही छोड़ दें। एक ही गति की चार गहराइयाँ: सौंप दीजिए। और यह गीता का अपना अंतिम वचन है — इस श्लोक के बाद कृष्ण और कुछ नहीं सिखाते।

परंपराएँ इसे कैसे पढ़ती हैं

स्रोत समीक्षाधीन
आदि शंकराचार्य · अद्वैत का चित्र

आदि शंकराचार्य · अद्वैत

शंकराचार्य के लिए चरम-श्लोक सम्पूर्ण संन्यास का अधिकार-पत्र है: जो छोड़ा जाता है वह है समस्त कर्म — धर्म और अधर्म दोनों — ताकि आत्मरूप में स्थिति हो।

धर्मशब्देन अत्र अधर्मोऽपि गृह्यते, नैष्कर्म्यस्य विवक्षितत्वात् — by the word 'dharma' here even adharma is included, for what is intended is actionlessness.

Śaṅkara Bhāṣya on 18.66 (Sanskrit, GitaDeep corpus; working rendering under review)

श्री रामानुज · विशिष्टाद्वैत का चित्र

श्री रामानुज · विशिष्टाद्वैत

रामानुज शाब्दिक अर्थ को नकारते हैं: कोई विहित कर्म नहीं छूटता — छूटती है केवल यह धारणा कि उसके कर्ता और स्वामी कभी आप थे।

'Relinquishing all Dharmas' —means the complete abandonment of the notion of agency, proprietorship, results etc., in the practice of Karma, Jñāna and Bhakti Yogas which are the means (dharmas) for attaining the highest good when done as Divine Service.

Gītā-bhāṣya on 18.66 — English translation (GitaDeep corpus)

श्री मध्वाचार्य · द्वैत का चित्र

श्री मध्वाचार्य · द्वैत

मध्व की कसौटी स्वयं वह दृश्य है — कृष्ण उसी साँस में युद्ध का आदेश देते हैं, इसलिए जो त्यागा जाता है वह केवल फल ही हो सकता है।

धर्मत्याग means renunciation of the fruits. Otherwise how can one speak of the methods in battle?

Madhva Bhāṣya on 18.66 — English translation (GitaDeep corpus)

श्री ज्ञानेश्वर · वारकरी का चित्र

श्री ज्ञानेश्वर · वारकरी

ज्ञानेश्वरी इस श्लोक को स्वयं अज्ञान के स्तर पर सुनती है: जो छोड़ा जाता है वह वही पूरा स्वप्न है जिसमें पुण्य और पाप बाँधते हैं।

Hope gives birth to pain, or slander to sin, or misfortune to poverty; in that way ignorance (Nescience) creates religion and non-religion leading to Heaven and Hell, and therefore abandon it all (ignorance) completely through knowledge.

Jñāneśvarī on 18.66, tr. R. K. Bhagwat (GitaDeep corpus)

स्वामी रामसुखदास · साधक-संजीवनी

साधना-दृष्टि: शरण अनेक उपदेशों में से एक नहीं, बल्कि उन सबका सार है।

Refuge in the Lord, is the quintessence, of the gospel of the Lord.

Sādhak Sañjīvanī on 18.66 — English translation (GitaDeep corpus)

जहाँ परंपराएँ भिन्न हैं, हम वह अंतर दिखाते हैं।

सूत्र आगे बढ़ाएँ

इस पर पूछें — शरण में जाना मुझसे असल में क्या माँगता है?