भगवद्गीता · अध्याय 11 · Viśvarūpa Darśana Yoga
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा
nāhaṃ vedairna tapasā na dānena na cejyayā|
śakya evaṃvidho draṣṭuṃ dṛṣṭavānasi māṃ yathā||
शब्दार्थ
यथा = जिस प्रकार (तुमने)
माम् = मुझे
दृष्टवान् = देखा
असि = है,
एवंविधः = इस प्रकारका
अहम् = (चतुर्भुजस्वपाला)में
न = न तो
वेदैः = वेदोंसे,
न = न
तपसा = तपसे,
न = न
दानेन = दानसे
च = और
न = न
इत्यया = यज्ञसे ही
द्रष्टुम् = देखा
शक्यः = जा सकता हूँ।
अनुवाद
जिस प्रकार तुमने मुझको देखा है—इस प्रकार चतुर्भुज रूप वाला मैं न वेदों से, न तपसे, न दानसे, और न यज्ञ से ही देखा जा सकता हूँ।
टीका
इस श्लोक के चारों ओर विराजमान टीकाकार

आदि शंकराचार्य · अद्वैत
हिंदी
श्री ज्ञानेश्वर · वारकरी
हिंदी(11.682) हे सुभट! इस रूप की प्राप्ति के लिए साधनों के मार्ग नहीं हैं तथा छहों शास्त्रों-सहित वेद भी इससे हार खा चुके हैं। (11.683) हे धनुर्धर! मुझ विश्वरूप के मार्ग से चलने के लिए सब तपों के समूह में भी योग्यता नहीं है
(11.684) तथा दान इत्यादि साधनों से भी मेरी प्राप्ति होना निश्चय से कठिन है। यज्ञों से भी मैं वैसा हाथ नहीं आता जैसा तुमने मुझे सुख से देख लिया।
(11.685) ऐसा मैं एक ही रीति से प्राप्त हो सकता हूँ अर्थात् जब भक्ति आकर चित्त को जयमाल पहनावे।

श्री उड़िया बाबा · आधुनिक
हिंदीभावार्थ— तुमने मुझे जैसा देखा है वैसा मैं वेदाध्ययन, तपस्या, दान या यज्ञ करने से भी नहीं देखा जा सकता।
संगति— मैं क्या करने से देखा जा सकता हूँ—यह अब बताते हैं—
दरिद्री लोग सुवर्ण को उसी रूप में देखते हैं और जानते हैं किन्तु भाग्य के बिना उन अभागों को उसका अधिकार प्राप्त नहीं होता, उसी प्रकार इस आत्मा को जानते हुए भी विषयी लोग श्रवण, मनन और ज्ञान प्राप्त कर लेने पर भी वैराग्य रूप भाग्य के बिना साक्षात् विशुद्ध चिद्घन रूप से अनुभव नहीं कर पाते।
स्वामी रामसुखदास · आधुनिक
हिंदी‘दृष्टवानसि मां यथा’—तुमने मेरा चतुर्भुजस्वप मेरी कृपासे ही देखा है। तात्पर्य है कि मेरे दर्शन मेरी कृपासे ही हो सकते हैं, किसी योग्यतासे नहीं।
‘नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चैत्यया शक्य एवंविधो द्रष्टुम्’—यह एक सिद्धान्तकी बात है कि जो चीज किसी मूल्यसे खरीदी जाती है, वह चीज उस मूल्यसे कम मूल्यकी ही होती है। जैसे, कोई दुकानदार एक घड़ी सौ रुपयोंमें बेचता है, तो उसने वह घड़ी कम मूल्यमें ली है, तभी तो वह सौ रुपयोंमें देता है। इसी तरह अनेक वेदोंका अध्ययन करनेपर, बहुत बड़ी तपस्या करनेपर, बहुत बड़ा दान देनेपर तथा बहुत बड़ा यज्ञ-अनुष्ठान करनेपर भगवान् मिल जायेंगे—ऐसी बात नहीं है। कितनी ही महान् क्रिया क्यों न हो, कितनी ही योग्यता सम्पन्न क्यों न की जाय, उसके द्वारा भगवान् खरीदे नहीं जा सकते। वे सब-के-सब मिलकर भी भगवत्प्राप्तिका मूल्य नहीं हो सकते। उनके द्वारा भगवान्पर अधिकार नहीं जमाया जा सकता। अर्जुनने इसी अध्यायके तैतालीसवें श्लोकमें साफ कहा है कि त्रिलोकीमें आपके समान भी कोई नहीं है, फिर आपसे अधिक हो ही कैसे सकता है? तात्पर्य है कि आपसे अधिक हुए बिना आपपर अधिकार नहीं किया जा सकता।
सांसारिक चीजोंमें तो अधिक योग्यतावाला कम योग्यतावालेपर आधिपत्य कर सकता है, अधिक बुद्धिमान् कम बुद्धिवालोंपर अपना रोब जमा सकता है, अधिक धनवान् निर्धनोंपर अपनी अधिकता प्रकट कर सकता है; परन्तु भगवान् किसी बल, बुद्धि, योग्यता, व्यक्ति, वस्तु आदिसे खरीदे नहीं जा सकते। कारण कि जिस भगवान्के
संकल्पमात्रसे तत्काल अनन्त ब्रह्माण्डोंकी रचना हो जाती है, उसे एक ब्रह्माण्डके भी किसी अंशमें रहनेवाले किसी वस्तु, व्यक्ति आदिसे कैसे खरीदा जा सकता है? तात्पर्य यह है कि भगवान्की प्राप्ति केवल भगवान्की कृपासे ही होती है। वह कृपा तब प्राप्त होती है, जब मनुष्य अपनी सामर्थ्य, समय, समझ, सामग्री आदिको भगवान्के सर्वथा अर्पण करके अपनेमें सर्वथा निर्बलता, अयोग्यताका अनुभव करता है अर्थात् अपने बल, योग्यता आदिका किंचिन्मात्र भी अभिमान नहीं करता। इस प्रकार जब वह सर्वथा निर्बल होकर अपने-आपको भगवान्के सर्वथा समर्पित करके अनन्यभावसे भगवान्को पुकारता है, तब भगवान् तत्काल प्रकट हो जाते हैं। कारण कि जबतक मनुष्यके अन्तःकरणमें प्राकृत वस्तु, योग्यता, बल, बुद्धि आदिका महत्त्व और सहारा रहता है, तबतक भगवान् अत्यन्त नजदीक होनेपर भी दूर दीखते हैं।
इस श्लोकमें जो दुर्लभता बतायी गयी है, वह चतुर्भुजस्वपके लिये ही बतायी गयी है, विश्वस्वपके लिये नहीं। अगर इसको विश्वस्वपके लिये ही मान लिया जाय तो पुनरुक्ति-दोष आ जायगा; क्योंकि पहले अड़तालीसवें श्लोकमें विश्वस्वपकी दुर्लभता बतायी जा चुकी है। दूसरी बात, आगेके श्लोकमें भगवान्ने अनन्यभक्तिसे अपनेको देखा जाना शक्य बताया है। विश्वस्वपमें अनन्यभक्ति हो ही नहीं सकती, क्योंकि अर्जुन-जैसे शूरवीर पुरुष भगवान्से दिव्यदृष्टि प्राप्त करके भी विश्वस्वपको देखकर भयभीत हो गये, तो उस रूपमें अनन्यभक्ति, अनन्यप्रेम, आकर्षण कैसे हो सकता है? अर्थात् नहीं हो सकता।
सम्बन्ध—जब कोई किसी साधनसे, किसी योग्यतासे, किसी सामग्रीसे आपको प्राप्त नहीं कर सकता, तो फिर आप कैसे प्राप्त किये जाते हैं—इसका उत्तर भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।

आदि शंकराचार्य · अद्वैत
संस्कृतन अहं वेदैः ऋग्यजुःसामाथर्ववेदैः चतुर्भिरपि, न तपसा उग्रेण चान्द्रायणादिना, न दानेन गोभूहिरण्यादिना, न च इज्यया यज्ञेन पूजया वा शक्यः एवंविधः यथादर्शितप्रकारः द्रष्टुं दृष्टवान् असि मां यथा त्वम् ॥ कथं पुनः शक्यः इति उच्यते --

श्री रामानुज · विशिष्टाद्वैत
अंग्रेज़ीश्लोक 11.53–54 पर
Only by bhakti or exclusive loving devotion can the Supreme Lord Krishna be known as He really is.
Study of the Vedas, meditation, performance of rituals, extreme austerities etc. are of no avail in perceiving Lord Krishna as paramātma or the Supreme Soul within all living entities and realising Him as He is.
But by bhakti Lord Krishna is easy to be known through the grace of the spiritual master who teaches the true purport of the Vedic scriptures which all relate to Lord Krishna.
Only by bhakti is it possible to have communion with the Supreme Lord Krishna as the actual experience of ātma-tattva or soul realisation which activates one's divine relationship with Him.
The Katha Upaniṣad II.XXIII states:
“not by reflection, nor deliberation, nor concentration can Lord Krishna be attained. He can only be attained by one who He, Himself specially elects and blesses to reveal His essence to.”

श्री ज्ञानेश्वर · वारकरी
मराठीपैं उपायांसि वाटा । न वाहती एथ सुभटा । साहीसहित वोहटा । वाहिला वेदीं ॥ ६८२ ॥ मज विश्वरूपाचिया मोहरा । चालावया धनुर्धरा । तपांचियाही संभारा । नव्हेचि लागु ॥ ६८३ ॥ आणि दानादि कीर कानडें । मी यज्ञींही तैसा न सांपडें । जैसेनि कां सुरवाडें । देखिला तुवां ॥ ६८४ ॥ तैसा मी एकीचि परि । आंतुडें गा अवधारीं । जरी भक्ति येऊनि वरी । चित्तातें गा ॥ ६८५ ॥

श्री ज्ञानेश्वर · वारकरी
अंग्रेज़ी53 "Not by (reciting) Vedas, not by askesis, not by alms-givings, nor also by worship am I capable of being beheld the way thou hast beholden Me. (682)
O Thou great warrior, thus utterly futile are all means of finding a pathway leading here. So, even the Vedas, with their sixfold lores, turn their back upon this great vision in despair. Even the hosts of austere penances are maimed in walking the path to my Omnipresent Divinity. To charities too, that Divinity is a sealed book; nor do the sacrificial works unravel that mysterious all-filling vision, on which your eyes have so sumptuously feasted. There is one pathway that leads to that vision unfailingly, you hear my words. It is the path that opens up where mind and soul are enwrapped in devotional love.
स्वामी रामसुखदास · आधुनिक
अंग्रेज़ी'Dṛṣṭavānasi māṃ yathā'—The Lord, says to Arjuna, that he has seen His four-armed divine form, only by His grace. He seeks to convey that a devotee, can have His vision, only by His grace, not by any other qualification.
'Nāham vedairna tapasā na dānena na cejyayā śakya evaṃvidho draṣṭum'—A man can buy an article for a hundred rupees, only if its cost to the shopkeeper is less than a hundred rupees. Similarly, if the Lord can be bought by means of Vedas, or penance or charity or ritual, it means that He is cheaper than these meritorious deeds. But, actually it is not so, all these meritorious acts, cannot equal the Lord, in cost. He is far superior, to all merit and deed. How can, He be bought by a human being, or an object resting in a negligible fragment of the universe, created by Him? He can be attained, only by His grace. The Lord showers His grace, on a person, when he, renouncing his pride of his possessions and resources, surrenders himself to Him. In that case, the Lord reveals Himself immediately. Till a man attaches importance to material things, ability, power and understanding etc., and relies upon these, the Lord remains, afar
in spite of, being the nearest.
Here, the vision of the Lord's four-armed form, rather than the cosmic form, has been declared as rare, because the cosmic form has already been glorified in almost identical words, in the forty-eighth verse. If we take it as praise of the cosmic form, it means that we expose the Lord to a charge of repetition. Also in the next verse the Lord Himself explains, that He can be seen in this form by exclusive devotion. The cosmic form cannot be viewed by exclusive devotion, because how can a devotee have exclusive devotion, for His cosmic form, when even the valiant devotee Arjuna, was terrified of that form, while having divine vision?
Link:—When the Lord cannot be seen by any meritorious deed, how can He be seen then? Lord Kṛṣṇa, suggests the means, in the next two verses.
किस लिये ?—
जिस प्रकार मुझे तूने देखा है ऐसे पहले दिखलाये हुए रूपवाला मैं न तो ऋक्, यजु, साम और अथर्व आदि चारों वेदोंसे, न चान्द्रायण आदि उग्र तपोंसे, न गौ, भूमि तथा सुवर्ण आदिके दानसे और न यजनसे ही देखा जा सकता हूँ अर्थात् यज्ञ या पूजासे भी मैं (इस प्रकार) नहीं देखा जा सकता