भगवद्गीता · अध्याय 11 · Viśvarūpa Darśana Yoga
यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः
समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति
तथा तवामी नरलोकवीरा
विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति
yathā nadīnāṃ bahavo'mbuvegāḥ
samudramevābhimukhā dravanti|
tathā tavāmī naralokavīrā
viśanti vaktrāṇyabhivijvalanti||
शब्दार्थ
यथा = जैसे
नदीनाम् = नदियोंके
बहवः = बहुत-से
अम्बुवेगाः = जलके प्रवाह
एव = (स्वाभाविक) ही
समुद्रम् = समुद्रके
अभिमुखाः = सम्मुख
द्रवन्ति = दौड़ते हैं,
तथा = ऐसे ही
अमी = वे
नरलोकवीराः = संसारके महान् शूरवीर
तव = आपके
अभिविच्छलन्ति = सब तरफसे देदीप्यमान
वक्त्राणि = मुखोंमें
विशन्ति = प्रवेश कर रहे हैं।
अनुवाद
जैसे नदियों के बहुत-से जल के प्रवाह स्वाभाविक ही समुद्र के ही सम्मुख दौड़ते हैं अर्थात् समुद्र में प्रवेश करते हैं, वैसे ही वे नरलोक के वीर भी आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।
टीका
इस श्लोक के चारों ओर विराजमान टीकाकार

आदि शंकराचार्य · अद्वैत
हिंदी
श्री ज्ञानेश्वर · वारकरी
हिंदी(11.423) जैसे महानदी के प्रवाह अचिरात् समुद्र में जा मिलते हैं, वैसे ही जगत् चहुँओर से इस मुख में प्रवेश कर रहा है।
(11.424) प्राणीगण आयुष्य-मार्ग में रात-दिनरूपी सीढ़ियाँ बना कर वेग से इस मुख में मिलने की साधना कर रहे हैं।

श्री उड़िया बाबा · आधुनिक
हिंदीभावार्थ— जैसे नदियों के बहुत से प्रवाह समुद्र की ओर दौड़ते चले जाते हैं उसी प्रकार से मानवलोक के वीर आपके प्रज्वलित मुखों में प्रविष्ट होते जा रहे हैं।
स्वामी रामसुखदास · आधुनिक
हिंदी‘यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति’—मूलमें जलमात्र समुद्रका है। वही जल बादलोंके द्वारा वर्षारूपमें पृथ्वीपर बरसकर झरने, नाले आदिको लेकर नदियोंका रूप धारण करता है। उन नदियोंके जितने वेग हैं, प्रवाह हैं, वे सभी स्वाभाविक ही समुद्रकी तरफ दौड़ते हैं। कारण कि जलका उद्गम स्थान समुद्र ही है। वे सभी जल-प्रवाह समुद्रमें जाकर अपने नाम
फँस जाते हैं। ऐसे ही आपके मुखोंमें प्रविष्ट होनेवालोंमेंसे कई-एक तो सीधे भीतर (पेटमें) चले जा रहे हैं, पर कई-एक चूर्ण हुए मस्तकोंसहित आपके दाँतों और दाढ़ोंके बीचमें फँसे हुए दीख रहे हैं।
यहाँ एक शंका होती है कि योद्धालोग तो अभी सामने युद्धक्षेत्रमें खड़े हुए हैं, फिर वे अर्जुनको विराटरूपके मुखोंमें जाते हुए कैसे दिखायी दिये? इसका समाधान यह है कि भगवान् विराटरूपमें अर्जुनको आसन्न भविष्यकी बात दिखा रहे हैं। भगवान्ने विराटरूप दिखाते समय अर्जुनसे कहा था कि तू और भी जो कुछ देखना चाहता है, वह भी मेरे इस विराटरूपमें देख ले (सातवाँ श्लोक)। अर्जुनके मनमें सन्देह था कि युद्धमें हमारी जीत होगी या कौरवोंकी? (दूसरे अध्यायका छठा श्लोक) इसलिये उस सन्देहको दूर करनेके लिये भगवान् अर्जुनको आसन्न भविष्यका दृश्य दिखाकर मानो यह बताते हैं कि युद्धमें तुम्हारी ही जीत होगी। आगे अर्जुनके द्वारा प्रश्न करनेपर भी भगवान्ने यही बात कही है (बत्तीसवेंसे चौतीसवें श्लोकतक)।
और रूपको छोड़कर अर्थात् गंगा, यमुना, सरस्वती आदि नामोंको और प्रवाहके रूपको छोड़कर समुद्ररूप ही हो जाते हैं। फिर वे जल-प्रवाह समुद्रके सिवाय अपना कोई अलग, स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं रखते। वास्तवमें तो उनका स्वतन्त्र अस्तित्व पहले भी नहीं था, केवल नदियोंके प्रवाहरूपमें होनेके कारण वे अलग दीखते थे।
‘तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभि-
**विज्वलन्ति**—नदियोंकी तरह मात्र जीव नित्य सुखकी अभिलाषाको लेकर परमात्माके सम्मुख ही दौड़ते हैं। परन्तु भूलसे असत्, नाशवान् शरीरके साथ सम्बन्ध मान लेनेसे वे सांसारिक संग्रह और संयोगजन्य सुखमें लग जाते हैं तथा अपना अलग अस्तित्व मानने लगते हैं। उन जीवोंमें वे ही वास्तविक शूरवीर हैं, जो सांसारिक संग्रह और सुखभोगोंमें न लगकर, जिसके लिये शरीर
मिला है, उस परमात्मप्राप्तिके मार्गमें ही तत्परतासे लगे हुए हैं। ऐसे युद्धमें आये हुए भीष्म, द्रोण आदि नरलोकवीर आपके प्रकाशमय (ज्ञानस्वरूप) मुखोंमें प्रविष्ट हो रहे हैं।
सामने दीखनेवाले लोगोंमें परमात्मप्राप्ति चाहनेवाले लोग विलक्षण हैं और बहुत थोड़े हैं। अतः उनके लिये परोक्षवाचक 'अमी' (वे) पद दिया गया है।
**सम्बन्ध**—जो राज्य और प्रशंसाके लोभसे युद्धमें आये हैं और जो सांसारिक संग्रह और भोगोंकी प्राप्तिमें लगे हुए हैं—ऐसे पुरुषोंका विराट् रूपमें पतंगोंके दृष्टान्तसे प्रवेश करनेका वर्णन अर्जुन आगेके श्लोकमें करते हैं।
**यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।**

आदि शंकराचार्य · अद्वैत
संस्कृतयथा नदीनां स्रवन्तीनां बहवः अनेके अम्बूनां वेगाः अम्बुवेगाः त्वराविशेषाः समुद्रमेव अभिमुखाः प्रतिमुखाः द्रवन्ति प्रविशन्ति, तथा तद्वत् तव अमी भीष्मादयः नरलोकवीराः मनुष्यलोके शूराः विशन्ति वक्त्राणि अभिविज्वलन्ति प्रकाशमानानि ॥ ते किमर्थं प्रविशन्ति कथं च इत्याह --

श्री रामानुज · विशिष्टाद्वैत
अंग्रेज़ीश्लोक 11.26–29 पर
As inanimate currents of rapid rivers are helplessly propelled into the ocean as given in the previous verse and like animate moths speedily flit into a blazing fire and are destroyed.
The mighty warriors of the Kaurāva and Pāṇḍava armies are propelled helplessly as they speedily rush to their deaths on the battlefield and into the fiery mouths of Lord Krishna's Viśvarūpa or divine universal form.

श्री मध्वाचार्य · द्वैत
मध्व भाष्यसंस्कृतअंग्रेज़ीश्लोक 11.28–11.31 पर
“धर्मान्तरज्ञानार्थमेव, को भवान् इति पृच्छति | यथा क्वचित् किञ्चिन्नामादिकं जानन्नपि जातिज्ञानार्थं पृच्छति कस्य इति | यदि तमेव न जानाति, तर्हि विष्णोः इत्येव सम्बोधनं न स्यात् ? त्वमक्षरम् इत्यादि च ||” - To know further details, ‘Tell me who You are’. In the normal life even though one knows others by their attributes, they do not know them by their inherent nature. Therefore the question ‘Tell me who You are’. It is not that Arjuna did not know. Otherwise, using words Vishnu or the Imperishable would appear contradictory.

श्री मध्वाचार्य · द्वैत
गीता तात्पर्य निर्णयसंस्कृतअंग्रेज़ीश्लोक 11.28–11.31 पर
“विशेषगुणकर्मविषय एव प्रश्नः | विष्णोः इति सम्बोधनात् ||” - To know the details of the special attributes and the performance is the question ‘Tell me who You are’.

श्री ज्ञानेश्वर · वारकरी
मराठीजैसे महानदीचे वोघ । वहिले ठाकिती समुद्राचें आंग । तैसें आघवाचिकडूनि जग । प्रवेशत मुखीं ॥ ४२३ ॥ आयुष्यपंथें प्राणिगणी । करोनि अहोरात्रांची मोवणी । वेगें वक्त्रामिळणीं । साधिजत आहाती ॥ ४२४ ॥

श्री ज्ञानेश्वर · वारकरी
अंग्रेज़ी28 “As of the rivers their water-rapids race onward heading sheer for the ocean, so these heroes of the world of men enter Thy fierce-flaming mouths. (423)
Just as the courses of big rivers move gently and easily into the ocean, so the entire universe on all sides is rushing into these mouths. All created beings moving along the pathway of life are speedily treading the footsteps of days and nights, to bring to consummation the journey’s end by being united with thy mouth.
स्वामी रामसुखदास · आधुनिक
अंग्रेज़ी'Yathā nadīnām bahavo'mbuvegāh samudramevābhimukhā dravanti'—The source of the water of a river is, ocean. Water evaporates from the ocean, falls as rain, on the earth and shapes as rivers. So, rivers have a natural tendency to flow towards the ocean and finally lose their names and identity, by merging with an ocean. In fact, they had no identity of their own, even in the past, but they merely appeared separate, in the form of the flow of rivers.
'Tathā tavāmī nara lokavīrā viśanti vaktrānyabhivijvalanti'—Just like, rivers, all the creatures rush towards the Lord, to attain eternal bliss. But, some of them by identifying themselves with the perishable and unreal body, are engaged in worldly pleasures and prosperity, and thus by error, accept their separate existence. But there are other valiant devotees who, not taking any heed for pleasures and prosperity, march towards God, in order to, attain the goal of human life. Bhīṣma and Droṇa etc., were such valiant warriors, who entered the Lord's mouths, blazing with
the fire of knowledge, and thus they became fiery themselves, by attaining oneness with Him.
The term 'Amī (those), has been used to denote, the small number and significance of devotees who strive for, God-realization.
*Link:— Arjuna, in the next verse, describes those warriors who being engaged in worldly pleasures and prosperity, joined the war in order to gain praise and kingdom, illustrated by moths.*
| यथा | प्रदीमं | ज्वलनं | पतङ्गा | | --- | --- | --- | --- |
'वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति' इस अगले श्लोकके वाक्यांशसे इस वाक्यका सम्बन्ध है।
वे किस प्रकार मुखोंमें प्रवेश करते हैं, सो कहते हैं—
जैसे चलती हुई नदियोंके बहुत-से जलप्रवाह बड़े वेगसे समुद्रके सम्मुख हुए ही दौड़ते हैं—समुद्रमें ही प्रवेश करते हैं, वैसे ही यह मनुष्यलोकके शूरवीर भीष्मादि आपके प्रज्वलित प्रकाशमान मुखोंमें प्रवेश कर रहे हैं