अध्याय 11 · प्रवाह में पढ़ें

विश्वरूप दर्शन योग

Viśvarūpa Darśana Yoga · विश्वरूपदर्शनयोग

अर्जुन उवाच

मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम्

यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम

arjuna uvāca

madanugrahāya paramaṃ guhyamadhyātmasaṃjñitam|

yattvayoktaṃ vacastena moho'yaṃ vigato mama||

अर्जुन बोले-मुझ पर अनुग्रह करने के लिये आपने जो परम गोपनीय अध्यात्मविषयक वचन अर्थात् उपदेश कहा, उससे मेरा यह अज्ञान नष्ट हो गया है।

भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया

त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम्

bhavāpyayau hi bhūtānāṃ śrutau vistaraśo mayā|

tvattaḥ kamalapatrākṣa māhātmyamapi cāvyayam||

क्योंकि हे कमलनेत्र! मैंने आपसे भूतों की उत्पत्ति और प्रलय विस्तारपूर्वक सुने हैं तथा आपकी अविनाशी महिमा भी सुनी है।

एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर

द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम

evametadyathāttha tvamātmānaṃ parameśvara|

draṣṭumicchāmi te rūpamaiśvaraṃ puruṣottama||

हे परमेश्वर! आप अपने को जैसा कहते हैं, यह ठीक ऐसा ही है; परंतु हे पुरुषोत्तम! आपके ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य और तेजसे युक्त ऐश्वर-रूप को मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ।

मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो

योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयाऽत्मानमव्ययम्

manyase yadi tacchakyaṃ mayā draṣṭumiti prabho|

yogeśvara tato me tvaṃ darśayā'tmānamavyayam||

हे प्रभो! यदि मेरे द्वारा आपका वह रूप देखा जाना शक्य है—ऐसा आप मानते हैं, तो हे योगेश्वर! उस अविनाशी स्वरूप का मुझे दर्शन कराइये।

श्री भगवानुवाच

पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः

नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च

śrī bhagavānuvāca

paśya me pārtha rūpāṇi śataśo'tha sahasraśaḥ|

nānāvidhāni divyāni nānāvarṇākṛtīni ca||

श्रीभगवान् बोले—हे पार्थ! अब तू मेरे सैकड़ों-हजारों नाना प्रकार के और नाना वर्ण तथा नाना आकृति वाले अलौकिक रूपों को देख।

पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा

बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याऽश्चर्याणि भारत

paśyādityānvasūnrudrānaśvinau marutastathā|

bahūnyadṛṣṭapūrvāṇi paśyā'ścaryāṇi bhārata||

हे भरतवंशी अर्जुन! मुझमें आदित्यों को अर्थात् अदिति के द्वादश पुत्रों को, आठ वसुओं को, एकादश रुद्रों को, दोनों अश्विनी कुमारों को और उनचास मरुद्गणों को देख तथा और भी बहुत-से पहले न देखे हुए आश्चर्यमय रूपों को देख।

इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम्

मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि

ihaikasthaṃ jagatkṛtsnaṃ paśyādya sacarācaram|

mama dehe guḍākeśa yaccānyaddraṣṭumicchasi||

हे अर्जुन! अब इस मेरे शरीर में एक जगह स्थित चराचरसहित सम्पूर्ण जगत् को देख तथा और भी जो कुछ देखना चाहता हो सो देख।

न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा

दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्

na tu māṃ śakyase draṣṭumanenaiva svacakṣuṣā|

divyaṃ dadāmi te cakṣuḥ paśya me yogamaiśvaram||

परन्तु मुझको तू इन अपने प्राकृत नेत्रों द्वारा देखने में निःसंदेह समर्थ नहीं है; इसी से मैं तुझे दिव्य अर्थात् अलौकिक चक्षु देता हूँ; उससे तू मेरी ईश्वरीय योग शक्ति को देख।

सञ्जय उवाच

एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः

दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्

sañjaya uvāca

evamuktvā tato rājanmahāyogeśvaro hariḥ|

darśayāmāsa pārthāya paramaṃ rūpamaiśvaram||

सञ्जय बोले—हे राजन्! महायोगेश्वर और सब पापों के नाश करने वाले भगवान् ने इस प्रकार कहकर उसके पश्चात् अर्जुन को परम ऐश्वर्य युक्त दिव्य स्वरूप दिखलाया।

अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम्

अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्

anekavaktranayanamanekādbhutadarśanam|

anekadivyābharaṇaṃ divyānekodyatāyudham||

अनेक मुख और नेत्रों से युक्त, अनेक अद्भुत दर्शनों वाले, बहुत-से दिव्य भूषणों से युक्त और बहुत-से दिव्य शस्त्रों को हाथों में उठाये हुए, दिव्य माला और वस्त्रों को धारण किये हुए और दिव्य गन्ध का सारे शरीर में लेप किये हुए, सब प्रकार के आश्चर्यों से युक्त, सीमा रहित और सब ओर मुख किये हुए विराट् स्वरूप परमदेव परमेश्वर को अर्जुन ने देखा।

श्लोक 10–11

दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम्

सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम्

divyamālyāmbaradharaṃ divyagandhānulepanam|

sarvāścaryamayaṃ devamanantaṃ viśvatomukham||

अनेक मुख और नेत्रों से युक्त, अनेक अद्भुत दर्शनों वाले, बहुत-से दिव्य भूषणों से युक्त और बहुत-से दिव्य शस्त्रों को हाथों में उठाये हुए, दिव्य माला और वस्त्रों को धारण किये हुए और दिव्य गन्ध का सारे शरीर में लेप किये हुए, सब प्रकार के आश्चर्यों से युक्त, सीमा रहित और सब ओर मुख किये हुए विराट् स्वरूप परमदेव परमेश्वर को अर्जुन ने देखा।

श्लोक 10–11

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता

यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः

divi sūryasahasrasya bhavedyugapadutthitā|

yadi bhāḥ sadṛśī sā syādbhāsastasya mahātmanaḥ||

आकाश में हजार सूर्यों के एक साथ उदय होने से उत्पन्न जो प्रकाश हो, वह भी उस विश्व रूप परमात्मा के प्रकाश के सदृश कदाचित् ही हो।

तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा

अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा

tatraikasthaṃ jagatkṛtsnaṃ pravibhaktamanekadhā|

apaśyaddevadevasya śarīre pāṇḍavastadā||

पाण्डु पुत्र अर्जुन ने उस समय अनेक प्रकार से विभक्त अर्थात् पृथक्-पृथक् सम्पूर्ण जगत् को देवों के देव श्रीकृष्ण भगवान् के उस शरीर में एक जगह स्थित देखा।

ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः

प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत

tataḥ sa vismayāviṣṭo hṛṣṭaromā dhanañjayaḥ|

praṇamya śirasā devaṃ kṛtāñjalirabhāṣata||

उसके अनन्तर वह आश्चर्य से चकित और पुलकित शरीर, अर्जुन प्रकाशमय विश्व रूप परमात्मा को श्रद्धा-भक्ति सहित सिर से प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोला।

अर्जुन उवाच

पश्यामि देवांस्तव देव देहे

सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान्

ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ

मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान्

arjuna uvāca

paśyāmi devāṃstava deva dehe

sarvāṃstathā bhūtaviśeṣasaṅghān|

brahmāṇamīśaṃ kamalāsanastha

mṛṣīṃśca sarvānuragāṃśca divyān||

अर्जुन बोले—हे देव! मैं आपके शरीर में सम्पूर्ण देवों को तथा अनेक भूतों के समुदायों को, कमल के आसन पर विराजित ब्रह्मा को, महादेव को और सम्पूर्ण ऋषियों को तथा दिव्य सर्पों को देखता हूँ।

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं

पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम्

नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं

पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप

anekabāhūdaravaktranetraṃ

paśyāmi tvāṃ sarvato'nantarūpam|

nāntaṃ na madhyaṃ na punastavādiṃ

paśyāmi viśveśvara viśvarūpa||

हे सम्पूर्ण विश्व के स्वामिन्! आपको अनेक भुजा, पेट, मुख और नेत्रों से युक्त तथा सब ओर से अनन्त रूपों वाला देखता हूँ। हे विश्व रूप! मैं आपके न अन्त को देखता हूँ, न मध्य को और न आदि को ही।

किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च

तेजोराशिं सर्वतोदीप्तिमन्तम्

पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्

दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्

kirīṭinaṃ gadinaṃ cakriṇaṃ ca

tejorāśiṃ sarvatodīptimantam|

paśyāmi tvāṃ durnirīkṣyaṃ samantād

dīptānalārkadyutimaprameyam||

आपको मैं मुकुट युक्त, गदायुक्त और चक्र युक्त तथा सब ओर से प्रकाशमान तेज के पुञ्ज, प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के सदृश ज्योतियुक्त, कठिनता से देखे जाने योग्य और सब ओर से अप्रमेय स्वरूप देखता हूँ।

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं

त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्

त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता

सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे

tvamakṣaraṃ paramaṃ veditavyaṃ

tvamasya viśvasya paraṃ nidhānam|

tvamavyayaḥ śāśvatadharmagoptā

sanātanastvaṃ puruṣo mato me||

आप ही जानने योग्य परम अक्षर अर्थात् परब्रह्म परमात्मा हैं, आप ही इस जगत् के परम आश्रय हैं, आप ही अनादि धर्म के रक्षक हैं और आप ही अविनाशी सनातन पुरुष हैं। ऐसा मेरा मत है।

अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य

मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्

पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रम्

स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्

anādimadhyāntamanantavīrya

manantabāhuṃ śaśisūryanetram|

paśyāmi tvāṃ dīptahutāśavaktram

svatejasā viśvamidaṃ tapantam||

आपको आदि, अन्त और मध्य से रहित, अनन्त सामर्थ्य से युक्त, अनन्त भुजावाले, चन्द्र-सूर्यरूप नेत्रों वाले, प्रज्वलित अग्नि रूप मुखवाले और अपने तेज से इस जगत् को संतप्त करते हुए देखता हूँ।

द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि

व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः

दृष्ट्वाऽद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं

लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्

dyāvāpṛthivyoridamantaraṃ hi

vyāptaṃ tvayaikena diśaśca sarvāḥ|

dṛṣṭvā'dbhutaṃ rūpamugraṃ tavedaṃ

lokatrayaṃ pravyathitaṃ mahātman||

हे महात्मन्! यह स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का सम्पूर्ण आकाश तथा सब दिशाएँ एक आपसे ही परिपूर्ण हैं; तथा आपके इस अलौकिक और भयंकर रूप को देखकर तीनों लोक अति व्यथा को प्राप्त हो रहे हैं।

अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति

केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति

स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः

स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः

amī hi tvāṃ surasaṅghā viśanti

kecidbhītāḥ prāñjalayo gṛṇanti|

svastītyuktvā maharṣisiddhasaṅghāḥ

stuvanti tvāṃ stutibhiḥ puṣkalābhiḥ||

वे ही देवताओं के समूह आप में प्रवेश करते हैं और कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़ आपके नाम और गुणों का उच्चारण करते हैं तथा महर्षि और सिद्धों के समुदाय 'कल्याण हो' ऐसा कहकर उत्तम-उत्तम स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति करते हैं।

रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या

विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च

गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा

वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे

rudrādityā vasavo ye ca sādhyā

viśve'śvinau marutaścoṣmapāśca|

gandharvayakṣāsurasiddhasaṅghā

vīkṣante tvāṃ vismitāścaiva sarve||

जो ग्यारह रुद्र और बारह आदित्य तथा आठ वायु, साध्यगण, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार तथा मरुद्गण और पितरों का समुदाय तथा गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और सिद्धों के समुदाय हैं—वे सब ही विस्मित होकर आपको देखते हैं।

रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं

महाबाहो बहुबाहूरुपादम्

बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं

दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाऽहम्

rūpaṃ mahatte bahuvaktranetraṃ

mahābāho bahubāhūrupādam|

bahūdaraṃ bahudaṃṣṭrākarālaṃ

dṛṣṭvā lokāḥ pravyathitāstathā'ham||

हे महाबाहो! आपके बहुत मुख और नेत्रों वाले, बहुत हाथ, जंघा और पैरोंवाले, बहुत उदरों वाले और बहुत-सी दाढ़ों के कारण अत्यन्त विकराल महान् रूप को देखकर सब लोग व्याकुल हो रहे हैं तथा मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ।

नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं

व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्

दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा

धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो

nabhaḥspṛśaṃ dīptamanekavarṇaṃ

vyāttānanaṃ dīptaviśālanetram|

dṛṣṭvā hi tvāṃ pravyathitāntarātmā

dhṛtiṃ na vindāmi śamaṃ ca viṣṇo||

क्योंकि हे विष्णो! आकाश को स्पर्श करने वाले, देदीप्यमान, अनेक वर्णों से युक्त तथा फैलाये हुए मुख और प्रकाशमान विशाल नेत्रों से युक्त आपको देखकर भयभीत अन्तःकरण वाला मैं धीरज और शान्ति नहीं पाता हूँ।

दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि

दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि

दिशो न जाने न लभे च शर्म

प्रसीद देवेश जगन्निवास

daṃṣṭrākarālāni ca te mukhāni

dṛṣṭvaiva kālānalasannibhāni|

diśo na jāne na labhe ca śarma

prasīda deveśa jagannivāsa||

दाढ़ों के कारण विकराल और प्रलयकालकी अग्नि के समान प्रज्वलित आपके मुखों को देखकर मैं दिशाओं को नहीं जानता हूँ और सुख भी नहीं पाता हूँ। इसलिये हे देवेश! हे जगन्निवास! आप प्रसन्न हों।

अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः

सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः

भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथाऽसौ

सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः

amī ca tvāṃ dhṛtarāṣṭrasya putrāḥ

sarve sahaivāvanipālasaṅghaiḥ|

bhīṣmo droṇaḥ sūtaputrastathā'sau

sahāsmadīyairapi yodhamukhyaiḥ||

वे सभी धृतराष्ट्र के पुत्र राजाओं के समुदाय सहित आपमें प्रवेश कर रहे हैं और भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य तथा वह कर्ण और हमारे पक्षके भी प्रधान योद्धाओं के सहित सब-के-सब आपके दाढ़ों के कारण विकराल भयानक मुखों में बड़े वेग से दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं और कई एक चूर्ण हुए सिरोंसहित आपके दाँतों के बीच में लगे हुए दीख रहे हैं।

श्लोक 26–27

वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति

दंष्ट्राकरालानि भयानकानि

केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु

संदृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः

vaktrāṇi te tvaramāṇā viśanti

daṃṣṭrākarālāni bhayānakāni|

kecidvilagnā daśanāntareṣu

saṃdṛśyante cūrṇitairuttamāṅgaiḥ||

वे सभी धृतराष्ट्र के पुत्र राजाओं के समुदाय सहित आपमें प्रवेश कर रहे हैं और भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य तथा वह कर्ण और हमारे पक्षके भी प्रधान योद्धाओं के सहित सब-के-सब आपके दाढ़ों के कारण विकराल भयानक मुखों में बड़े वेग से दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं और कई एक चूर्ण हुए सिरोंसहित आपके दाँतों के बीच में लगे हुए दीख रहे हैं।

श्लोक 26–27

यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः

समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति

तथा तवामी नरलोकवीरा

विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति

yathā nadīnāṃ bahavo'mbuvegāḥ

samudramevābhimukhā dravanti|

tathā tavāmī naralokavīrā

viśanti vaktrāṇyabhivijvalanti||

जैसे नदियों के बहुत-से जल के प्रवाह स्वाभाविक ही समुद्र के ही सम्मुख दौड़ते हैं अर्थात् समुद्र में प्रवेश करते हैं, वैसे ही वे नरलोक के वीर भी आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।

यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा

विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः

तथैव नाशाय विशन्ति लोका

स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः

yathā pradīptaṃ jvalanaṃ pataṅgā

viśanti nāśāya samṛddhavegāḥ|

tathaiva nāśāya viśanti lokā

stavāpi vaktrāṇi samṛddhavegāḥ||

जैसे पतंग मोहवश नष्ट होने के लिये प्रज्वलित अग्नि में अतिवेग से दौड़ते हुए प्रवेश करते हैं, वैसे ही ये सब लोग भी अपने नाश के लिये आपके मुखों में अतिवेग से दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं।

लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ता

ल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः

तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं

भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो

lelihyase grasamānaḥ samantā

llokānsamagrānvadanairjvaladbhiḥ|

tejobhirāpūrya jagatsamagraṃ

bhāsastavogrāḥ pratapanti viṣṇo||

आप उन सम्पूर्ण लोकों को प्रज्वलित मुखों द्वारा ग्रास करते हुए सब ओर से बार-बार चाट रहे हैं, हे विष्णो! आपका उग्र प्रकाश सम्पूर्ण जगत् को तेज के द्वारा परिपूर्ण करके तपा रहा है।

आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो

नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद

विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं

न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्

ākhyāhi me ko bhavānugrarūpo

namo'stu te devavara prasīda|

vijñātumicchāmi bhavantamādyaṃ

na hi prajānāmi tava pravṛttim||

मुझे बतलाइये कि आप उग्ररूप वाले कौन हैं? हे देवों में श्रेष्ठ! आपको नमस्कार हो। आप प्रसन्न होइये। आदि पुरुष आपको मैं विशेष रूप से जानना चाहता हूँ, क्योंकि मैं आपकी प्रवृत्ति को नहीं जानता।

श्री भगवानुवाच

कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो

लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः

ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे

येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः

śrī bhagavānuvāca

kālo'smi lokakṣayakṛtpravṛddho

lokānsamāhartumiha pravṛttaḥ|

ṛte'pi tvāṃ na bhaviṣyanti sarve

ye'vasthitāḥ pratyanīkeṣu yodhāḥ||

श्रीभगवान् बोले—मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ महाकाल हूँ। इस समय इन लोकों को नष्ट करने के लिये प्रवृत्त हुआ हूँ। इसलिये जो प्रतिपक्षियों की सेना में स्थित योद्धा लोग हैं वे सब तेरे बिना भी नहीं रहेंगे अर्थात् तेरे युद्ध न करने पर भी इन सबका नाश हो जायेगा।

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व

जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्

मयैवैते निहताः पूर्वमेव

निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्

tasmāttvamuttiṣṭha yaśo labhasva

jitvā śatrūn bhuṅkṣva rājyaṃ samṛddham|

mayaivaite nihatāḥ pūrvameva

nimittamātraṃ bhava savyasācin||

अतएव तू उठ! यश प्राप्त कर और शत्रुओं को जीतकर धन-धान्य से सम्पन्न राज्य को भोग। ये सब शूरवीर पहले ही से मेरे ही द्वारा मारे हुए हैं। हे सव्यसाचिन्! तू तो केवल निमित्तमात्र बन जा।

द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च

कर्णं तथाऽन्यानपि योधवीरान्

मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा

युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्

droṇaṃ ca bhīṣmaṃ ca jayadrathaṃ ca

karṇaṃ tathā'nyānapi yodhavīrān|

mayā hatāṃstvaṃ jahi mā vyathiṣṭhā

yudhyasva jetāsi raṇe sapatnān||

द्रोणाचार्य और भीष्म पितामह तथा जयद्रथ और कर्ण तथा और भी बहुत-से-मेरे द्वारा मारे हुए शूरवीर योद्धाओं को तू मार। भय मत कर। निस्सन्देह तू युद्ध में वैरियों को जीतेगा। इसलिये युद्ध कर।

सञ्जय उवाच

एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य

कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी

नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं

सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य

sañjaya uvāca

etacchrutvā vacanaṃ keśavasya

kṛtāñjalirvepamānaḥ kirīṭī|

namaskṛtvā bhūya evāha kṛṣṇaṃ

sagadgadaṃ bhītabhītaḥ praṇamya||

संजय बोले—केशव भगवान् के इस वचन को सुनकर मुकुटधारी अर्जुन हाथ जोड़कर काँपता हुआ नमस्कार करके, फिर भी अत्यन्त भयभीत होकर प्रणाम करके भगवान् श्रीकृष्ण के प्रति गद्गद वाणी से बोला—।

अर्जुन उवाच

स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या

जगत् प्रहृष्यत्यनुरज्यते च

रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति

सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः

arjuna uvāca

sthāne hṛṣīkeśa tava prakīrtyā

jagat prahṛṣyatyanurajyate ca|

rakṣāṃsi bhītāni diśo dravanti

sarve namasyanti ca siddhasaṅghāḥ||

अर्जुन बोले—हे अन्तर्यामिन्! यह योग्य ही है कि आपके नाम, गुण और प्रभाव के कीर्तन से जगत् अति हर्षित हो रहा है और अनुराग को भी प्राप्त हो रहा है तथा भयभीत राक्षस लोग दिशाओं में भाग रहे हैं और सब सिद्धगणों के समुदाय नमस्कार कर रहे हैं।

कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्

गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे

अनन्त देवेश जगन्निवास

त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्

kasmācca te na nameranmahātman

garīyase brahmaṇo'pyādikartre|

ananta deveśa jagannivāsa

tvamakṣaraṃ sadasattatparaṃ yat||

हे महात्मन्! ब्रह्मा के भी आदि कर्ता और सबसे बड़े आपके लिये ये कैसे नमस्कार न करें; क्योंकि हे अनन्त! हे देवेश! हे जगन्निवास! जो सत्, असत् और उनसे परे अक्षर अर्थात् सच्चिदानन्दधन ब्रह्म है, वह आप ही हैं।

त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण

स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्

वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम

त्वया ततं विश्वमनन्तरूप

tvamādidevaḥ puruṣaḥ purāṇa

stvamasya viśvasya paraṃ nidhānam|

vettāsi vedyaṃ ca paraṃ ca dhāma

tvayā tataṃ viśvamanantarūpa||

आप आदि देव और सनातन पुरुष हैं, आप इस जगत् के परम आश्रय और जानने वाले तथा जानने योग्य और परम धाम हैं। हे अनन्त रूप! आपसे यह सब जगत् व्याप्त अर्थात् परिपूर्ण है।

वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः

प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च

नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः

पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते

vāyuryamo'gnirvaruṇaḥ śaśāṅkaḥ

prajāpatistvaṃ prapitāmahaśca|

namo namaste'stu sahasrakṛtvaḥ

punaśca bhūyo'pi namo namaste||

आप वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, प्रजा के स्वामी ब्रह्मा और ब्रह्मा के भी पिता हैं। आपके लिये हजारों बार नमस्कार! नमस्कार हो!! आपके लिये फिर भी बार-बार नमस्कार! नमस्कार!!

नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते

नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व

अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं

सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः

namaḥ purastādatha pṛṣṭhataste

namo'stu te sarvata eva sarva|

anantavīryāmitavikramastvaṃ

sarvaṃ samāpnoṣi tato'si sarvaḥ||

हे अनन्त सामर्थ्य वाले! आपके लिये आगे से और पीछे से भी नमस्कार! हे सर्वात्मन्! आपके लिये सब ओर से ही नमस्कार हो। क्योंकि अनन्त पराक्रमशाली आप सब संसार को व्याप्त किये हुए हैं, इससे आप ही सर्वरूप हैं।

सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं

हे कृष्ण हे यादव हे सखेति

अजानता महिमानं तवेदं

मया प्रमादात्प्रणयेन वापि

sakheti matvā prasabhaṃ yaduktaṃ

he kṛṣṇa he yādava he sakheti|

ajānatā mahimānaṃ tavedaṃ

mayā pramādātpraṇayena vāpi||

आपके इस प्रभाव को न जानते हुए, आप मेरे सखा हैं ऐसा मानकर प्रेम से अथवा प्रमाद से भी मैंने 'हे कृष्ण!', 'हे यादव!', 'हे सखे!' इस प्रकार जो कुछ बिना सोचे-समझे हटातू कहा है; और हे अच्युत! आप जो मेरे द्वारा विनोद के लिये विहार, शय्या, आसन और भोजनादि में अकेले अथवा उन सखाओं के सामने भी अपमानित किये गये हैं— वह सब अपराध अप्रमेय स्वरूप अर्थात् अचिन्त्य प्रभाव वाले आपसे मैं क्षमा करवाता हूँ।

श्लोक 41–42

यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि

विहारशय्यासनभोजनेषु

एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं

तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्

yaccāvahāsārthamasatkṛto'si

vihāraśayyāsanabhojaneṣu|

eko'thavāpyacyuta tatsamakṣaṃ

tatkṣāmaye tvāmahamaprameyam||

आपके इस प्रभाव को न जानते हुए, आप मेरे सखा हैं ऐसा मानकर प्रेम से अथवा प्रमाद से भी मैंने 'हे कृष्ण!', 'हे यादव!', 'हे सखे!' इस प्रकार जो कुछ बिना सोचे-समझे हटातू कहा है; और हे अच्युत! आप जो मेरे द्वारा विनोद के लिये विहार, शय्या, आसन और भोजनादि में अकेले अथवा उन सखाओं के सामने भी अपमानित किये गये हैं— वह सब अपराध अप्रमेय स्वरूप अर्थात् अचिन्त्य प्रभाव वाले आपसे मैं क्षमा करवाता हूँ।

श्लोक 41–42

पितासि लोकस्य चराचरस्य

त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्

न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो

लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव

pitāsi lokasya carācarasya

tvamasya pūjyaśca gururgarīyān|

na tvatsamo'styabhyadhikaḥ kuto'nyo

lokatraye'pyapratimaprabhāva||

आप इस चराचर जगत् के पिता और सबसे बड़े गुरु एवं अति पूजनीय हैं, हे अनुपम प्रभाव वाले! तीनों लोकों में आपके समान भी दूसरा कोई नहीं है, फिर अधिक तो कैसे हो सकता है।

तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं

प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम्

पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः

प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्

tasmātpraṇamya praṇidhāya kāyaṃ

prasādaye tvāmahamīśamīḍyam|

piteva putrasya sakheva sakhyuḥ

priyaḥ priyāyārhasi deva soḍhum||

अतएव हे प्रभो! मैं शरीर को भलीभाँति चरणों में निवेदित कर, प्रणाम करके, स्तुति करने योग्य आप ईश्वर को प्रसन्न होने के लिये प्रार्थना करता हूँ। हे देव! पिता जैसे पुत्र के, सखा जैसे सखा के और पति जैसे प्रियतमा पत्नी के अपराध सहन करते हैं—वैसे ही आप भी मेरे अपराध को सहन करने योग्य हैं।

अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा

भयेन च प्रव्यथितं मनो मे

तदेव मे दर्शय देव रूपं

प्रसीद देवेश जगन्निवास

adṛṣṭapūrvaṃ hṛṣito'smi dṛṣṭvā

bhayena ca pravyathitaṃ mano me|

tadeva me darśaya deva rūpaṃ

prasīda deveśa jagannivāsa||

मैं पहले न देखे हुए आपके इस आश्चर्यमय रूप को देखकर हर्षित हो रहा हूँ और मेरा मन भय से अति व्याकुल भी हो रहा है, इसलिये आप उस अपने चतुर्भुज विष्णु रूप को ही मुझे दिखलाइये! हे देवेश! हे जगन्निवास! प्रसन्न होइये।

किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त

मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव

तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन

सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते

kirīṭinaṃ gadinaṃ cakrahasta

micchāmi tvāṃ draṣṭumahaṃ tathaiva|

tenaiva rūpeṇa caturbhujena

sahasrabāho bhava viśvamūrte||

मैं वैसे ही आपको मुकुट धारण किये हुए तथा गदा और चक्र हाथ में लिये हुए देखना चाहता हूँ, इसलिये हे विश्व स्वरूप! हे सहस्रबाहो! आप उसी चतुर्भुज रूप से प्रकट होइये।

श्री भगवानुवाच

मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं

रूपं परं दर्शितमात्मयोगात्

तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं

यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्

śrī bhagavānuvāca

mayā prasannena tavārjunedaṃ

rūpaṃ paraṃ darśitamātmayogāt|

tejomayaṃ viśvamanantamādyaṃ

yanme tvadanyena na dṛṣṭapūrvam||

श्रीभगवान् बोले—हे अर्जुन! अनुग्रहपूर्वक मैंने अपनी योगशक्ति के प्रभाव से यह मेरा परम तेजोमय, सबका आदि और सीमारहित विराट् रूप तुझ को दिखलाया है, जिसे तेरे अतिरिक्त दूसरे किसी ने पहले नहीं देखा था।

न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै

र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः

एवंरूपः शक्य अहं नृलोके

द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर

na vedayajñādhyayanairna dānai

rna ca kriyābhirna tapobhirugraiḥ|

evaṃrūpaḥ śakya ahaṃ nṛloke

draṣṭuṃ tvadanyena kurupravīra||

हे अर्जुन! मनुष्य लोक में इस प्रकार विश्व रूप वाला मैं न वेद और यज्ञों के अध्ययन से, न दान से, न क्रियाओं से और न उग्र तपों से ही तेरे अतिरिक्त दूसरे के द्वारा देखा जा सकता हूँ।

मा ते व्यथा मा च विमूढभावो

दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम्

व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं

तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य

mā te vyathā mā ca vimūḍhabhāvo

dṛṣṭvā rūpaṃ ghoramīdṛṅmamedam|

vyapetabhīḥ prītamanāḥ punastvaṃ

tadeva me rūpamidaṃ prapaśya||

मेरे इस प्रकार के इस विकराल रूप को देखकर तुझको व्याकुलता नहीं होनी चाहिये और मूढभाव भी नहीं होना चाहिये। तू भयरहित और प्रीतियुक्त मनवाला होकर उसी मेरे इस शंख-चक्र-गदा-पद्मयुक्त चतुर्भुज रूप को फिर देख।

सञ्जय उवाच

इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा

स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः

आश्वासयामास च भीतमेनं

भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा

sañjaya uvāca

ityarjunaṃ vāsudevastathoktvā

svakaṃ rūpaṃ darśayāmāsa bhūyaḥ|

āśvāsayāmāsa ca bhītamenaṃ

bhūtvā punaḥ saumyavapurmahātmā||

सञ्जय बोले—वासुदेव भगवान् ने अर्जुन के प्रति इस प्रकार कहकर फिर वैसे ही अपने चतुर्भुज रूप को दिखलाया और फिर महात्मा श्रीकृष्ण ने सौम्यमूर्ति होकर इस भयभीत अर्जुन को धीरज दिया।

अर्जुन उवाच

दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तवसौम्यं जनार्दन

इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः

arjuna uvāca

dṛṣṭvedaṃ mānuṣaṃ rūpaṃ tavasaumyaṃ janārdana|

idānīmasmi saṃvṛttaḥ sacetāḥ prakṛtiṃ gataḥ||

अर्जुन बोले—हे जनार्दन! आपके इस अति शान्त मनुष्य रूप को देखकर अब मैं स्थिरचित्त हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थिति को प्राप्त हो गया हूँ।

श्री भगवानुवाच

सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम

देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः

śrī bhagavānuvāca

sudurdarśamidaṃ rūpaṃ dṛṣṭavānasi yanmama|

devā apyasya rūpasya nityaṃ darśanakāṅkṣiṇaḥ||

श्रीभगवान् बोले—मेरा जो चतुर्भुज रूप तुमने देखा है, यह सुदुर्दर्श है अर्थात् इसके दर्शन बड़े ही दुर्लभ हैं। देवता भी सदा इस रूप के दर्शन की आकाङ्क्षा करते रहते हैं।

नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया

शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा

nāhaṃ vedairna tapasā na dānena na cejyayā|

śakya evaṃvidho draṣṭuṃ dṛṣṭavānasi māṃ yathā||

जिस प्रकार तुमने मुझको देखा है—इस प्रकार चतुर्भुज रूप वाला मैं न वेदों से, न तपसे, न दानसे, और न यज्ञ से ही देखा जा सकता हूँ।

भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन

ज्ञातुं दृष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप

bhaktyā tvananyayā śakya ahamevaṃvidho'rjuna|

jñātuṃ dṛṣṭuṃ ca tattvena praveṣṭuṃ ca paraṃtapa||

परन्तु हे परंतप अर्जुन! अनन्य भक्ति के द्वारा इस प्रकार चतुर्भुज रूप वाला मैं प्रत्यक्ष देखने के लिये, तत्त्व से जानने के लिये तथा प्रवेश करने के लिये अर्थात् एकीभाव से प्राप्त होने के लिये भी शक्य हूँ।

मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः

निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव

matkarmakṛnmatparamo madbhaktaḥ saṅgavarjitaḥ|

nirvairaḥ sarvabhūteṣu yaḥ sa māmeti pāṇḍava||

हे अर्जुन! जो पुरुष केवल मेरे ही लिये सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को करने वाला है, मेरे परायण है, मेरा भक्त है, आसक्तिरहित है और सम्पूर्ण भूतप्राणियों में वैरभाव से रहित है—वह अनन्य भक्ति युक्त पुरुष मुझको ही प्राप्त होता है।

अध्याय दीया: unlit

भगवद्गीता का अध्याय 11 यहाँ समाप्त होता है —

विश्वरूप दर्शन योग

Viśvarūpa Darśana Yoga · विश्वरूपदर्शनयोग

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