भगवद्गीता · अध्याय 10 · Vibhūti Yoga

अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्

पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्

10.28

॥ १०.२९ ॥

10.30

anantaścāsmi nāgānāṃ varuṇo yādasāmaham|

pitṝṇāmaryamā cāsmi yamaḥ saṃyamatāmaham||

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शब्दार्थ

नागानाम् = नागोंमें

अनन्तः = अनन्त (शेषनाग)

च = और

यादसाम् = जल- जन्तुओंका

अधिपति = च

वरुणः = वरुण

अहम् = मैं

अस्मि = हूँ।

पितृणाम् = पितरोंमें

अर्यमा = अर्यमा और संयमताम् शासन करनेवालोंमें यमः यमराज अहम् मैं अस्मि हूँ।

अनुवाद

मैं नागों में शेष नाग और जलचरों का अधिपति वरुण देवता हूँ और पितरों में अर्यमा नामक पितर तथा शासन करने वालों में यमराज मैं हूँ।

टीका

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भाषा:
आदि शंकराचार्य का चित्र

आदि शंकराचार्य · अद्वैत

हिंदी

नागोंके नाना भेदोंमें मैं अनन्त हूँ अर्थात् नागराज शेष हूँ और जलसम्बन्धी देवोंमें उनका राजा वरुण मैं हूँ। मैं पितरोंमें अर्यमा नामक पितृराज हूँ और शासन करनेवालोंमें यमराज हूँ

श्री ज्ञानेश्वर का चित्र

श्री ज्ञानेश्वर · वारकरी

हिंदी

श्लोक 10.28–10.29 पर

(10.240) हे धनुर्धर। सब हथियारों में मैं वज्र हूँ जो सौ यज्ञ करके कृतार्थ होनेहारे इन्द्र के हाथ में रहता है।

(10.241) श्रीकृष्ण कहते हैं कि गौओं में जो कामधेनु है वह मैं हूँ, जन्म देनेहारों में जो मदन है वह मैं हूँ। (10.242) हे कुन्तीसुत! सर्पकुल का नायक वासुकी मैं हूँ और सम्पूर्ण नागों में मैं अनन्त हूँ।

(10.243) श्रीअनन्त कहते हैं कि जलचरों में जो पश्चिम दिशा का स्वामी वरुण है वह मैं हूँ।

(10.244) और मैं यथार्थ कह रहा हूँ कि सम्पूर्ण पितृगणों में जो पितृदेवता अर्यमा है वह मैं हूँ।

(10.245) जग के जो शुभाशुभ लिखनेहारे, प्राणियों के मन का खोज लेनेहारे और कर्मानुसार भोगों के देनेहारे हैं

(10.246) उन शासन करनेहारों में जो यम है, जो कर्म का साक्षिभूत धर्म है, वह मैं हूँ। इस प्रकार श्रीरमापति आत्माराम ने निरूपण किया और फिर कहा —

श्री उड़िया बाबा का चित्र

श्री उड़िया बाबा · आधुनिक

हिंदी

भावार्थ— मैं नागों में शेषनाग हूँ, जलचरों में वरुण हूँ पितरों में अर्यमा हूँ और शासन करने वालों में यम हूँ।

स्वामी रामसुखदास · आधुनिक

हिंदी

‘अनन्तश्चास्मि नागानाम्’—शेषनाग सम्पूर्ण नागोंके राजा हैं। इनके एक हजार फण हैं। ये क्षीरसागरमें सदा भगवान्की शय्या बनकर भगवान्को सुख पहुँचाते रहते हैं। ये अनेक बार भगवान्के साथ अवतार लेकर उनकी लीलामें शामिल हुए हैं। इसलिये भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है।

‘वरुणो यादसामहम्’—वरुण सम्पूर्ण जल-जन्तुओंके तथा जल-देवताओंके अधिपति हैं और भगवान्के भक्त हैं। इसलिये भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है।

‘पितृणामर्यमा चास्मि’—कव्यवाह, अनल, सोम आदि सात पितृगण हैं। इन सबमें अर्यमा नामवाले

पितर मुख्य हैं। इसलिये भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है।

‘यमः संयमतामहम्’—प्राणियोंपर शासन करनेवाले राजा आदि जितने भी अधिकारी हैं, उनमें यमराज मुख्य हैं। ये प्राणियोंको उनके पाप-पुण्योंका फल भुगताकर शुद्ध करते हैं। इनका शासन न्याय और धर्मपूर्वक होता है। ये भगवान्के भक्त और लोकपाल भी हैं। इसलिये भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है।

इन विभूतियोंमें जो विलक्षणता दीखती है, वह इनकी व्यक्तिगत नहीं है। वह तो भगवान्से ही आयी है और भगवान्की ही है। अतः इनमें भगवान्का ही चिन्तन होना चाहिये।

आदि शंकराचार्य का चित्र

आदि शंकराचार्य · अद्वैत

संस्कृत

अनन्तः च अस्मि नागानां नाग-विशेषाणां नाग-राजः च अस्मि । वरुणः यादसां अहम् अब्-देवतानां राजा अहम् । पितॄणां अर्यमा नाम पितृ-राजः च अस्मि । यमः संयमतां संयमनं कुर्वतां अहम् ॥

श्री रामानुज का चित्र

श्री रामानुज · विशिष्टाद्वैत

अंग्रेज़ी

Lord Krishna reveals that His vibhūti or divine, transcendental opulence among nāgānāṃ is Ananta. Nagas are non-poisonous serpents with many heads. The word yādasām means aquatics or inhabitants of water and of punishers and chastisers His vibhūti is Yamaraja.

श्री मध्वाचार्य का चित्र

श्री मध्वाचार्य · द्वैत

संस्कृतअंग्रेज़ी

श्लोक 10.26–10.30 पर

“सुखरूपः पाल्यते लीयते च जगदनेन, इति कपिलः | प्रीतिः सुख कमानन्दः इत्यभिदानात् | प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म इति च | ऋषिं प्रसूतं कपिलं यस्तमग्रे ज्ञानेर्विभति जायमानं च पश्येत् | सुखादनन्तात् पालानल्लापनाच्च यं वै देवं कपिलमुदाहरन्ति || इति वाभव्यशाखकयाम् ||” - क - having pleasant form, पि - to nourish and ल is to absorb the worlds, hence कपिलः. प्रीतिः is Love, सुखं is pleasure. क and आनन्दः meaning bliss are corresponding words. Similarly, प्राण is Brahman, कं is Brahman and खं is Brahman. “The Seer Kapila who knows through awareness what was born earlier, what is being born now, and what will be born hereafter, through immeasurable pleasure, through Bliss, through sustenance and through absorption, should be known as the Lord”, thus in Babhravya section.

श्री ज्ञानेश्वर का चित्र

श्री ज्ञानेश्वर · वारकरी

मराठी

श्लोक 10.28–10.29 पर

पैं आघवेयां हातियेरां । आंत वज्र तें मी धनुर्धरा । जें शतमखोत्तीर्णकरा । आरूढोनि असे ॥ २४० ॥

धेनूंमध्यें कामधेनु । तें मी म्हणे विष्वक्सेनु । जन्मवितयांआंत मदनु । तो मी जाणें ॥ २४१ ॥

सर्पकुळाआंत अधिष्ठाता । वासुकी गा मी कुंतीसुता । नागांमाजीं समस्तां । अनंतु तो मी ॥ २४२ ॥

अगा यादसांआंतु । जो पश्चिमप्रमदेचा कांतु । तो वरुण मी हें अनंतु । सांगत असे ॥ २४३ ॥

आणि पितृगणां समस्तां- । माजीं अर्यमा जो पितृदेवता । तो मी हें तत्त्वता । बोलत आहें ॥ २४४ ॥

जगाचीं शुभाशुभें लिहिती । प्राणियांच्या मानसांचा झाडा घेती । मग केलियानुरूप होती । भोगनियम जे ॥ २४५ ॥

तयां नियमितयांमाजीं यमु । जो कर्मसाक्षी धर्मु । तो मी म्हणे रामु । रमापती ॥ २४६ ॥

श्री ज्ञानेश्वर का चित्र

श्री ज्ञानेश्वर · वारकरी

अंग्रेज़ी

श्लोक 10.28–10.29 पर

28 "Of missiles I am the Vajra (thunderbolt), of milch-cows I am the Wish-milching (cow). I am Love the procreator. Of serpents I am Vāsuki. 29 "Ananta I am of the Nāgas (dragons), and I am Varuna of the aquatics; of the Manes I am Aryaman, I am Abstention (Yama) amongst the (mind) curbing (Yogic-aids). (240) Amongst the weapons, I am, Oh Dhanurdhara, the thunderbolt, that is flourished in the hands of Indra, the performer of a hundred sacrifices; *Kamadhenu* amongst cows. I am the God of Love amongst those that procreate. I am *Vāsuki* the chief of the serpent race; I am *Ananta* (Shesha) amongst the Nāgas (dragons-serpents-semi-gods having bodies of serpents and faces of men). I am *Varuṇa* the master beloved of the Maiden—“West-sky”—amongst the maids,” said *Ananta*. “I am *Aryama*, the Chief *Pitara* amongst Manes (Pitaras—ancestors or departed progenitors of human families). And I am that *Yama* (the chief of the arbiters of men who set down all good and evil actions of souls, keep vigil over the searching of the hearts of all beings and requite them for their actions by strict rules). I am then the (*Yama*) *Dharma*, the great judge of all actions,” said *Rāma*, the husband of *Ramā* (रमापती).

स्वामी रामसुखदास · आधुनिक

अंग्रेज़ी

'Anantaścāsmi nāgānām'—The 'Nāgas', are the snakes living in water. 'Ananta' is the lord of the snakes, with thousand hoods. It offers comfort to the Lord by acting, as His bed. It joined the Lord's sport several times, when He was incarnated. So, the Lord speaks of it as His divine glory.

'Varuṇo yādasāmaham'—Varuṇa, is the lord of the aquatic creatures and water-gods, and is a devotee of the Lord. So, he is a divine glory of the Lord.

'Pitṛṇāmaryamā cāsmi'—Aryamā, is the presiding deity, over all the seven manes such as Kavyavāha, Anala and Soma etc. So he is a divine glory of the Lord.

'Yamaḥ saṃyamatāmaham'—Yama is the lord of death. He purifies the beings, by enabling them, to reap the fruit of their virtuous and evil actions. He is very just, and righteous. He is a devotee of the Lord and a lord of his region. Therefore, he is a divine glory of the Lord.

The uniqueness in these glories, is not personal, which has emanated, only from the Lord. Therefore a striver, should think of the Lord, when he thinks of His divine glories.

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