अध्याय 10 · प्रवाह में पढ़ें

विभूति योग

Vibhūti Yoga · विभूतियोग

श्री भगवानुवाच

भूय एव महाबाहो श्रृणु मे परमं वचः

यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया

śrī bhagavānuvāca

bhūya eva mahābāho śrṛṇu me paramaṃ vacaḥ|

yatte'haṃ prīyamāṇāya vakṣyāmi hitakāmyayā||

श्रीभगवान् बोले-हे महाबाहो! फिर भी मेरे परम रहस्य और प्रभावयुक्त वचन को सुन, जिसे मैं तुझ अतिशय प्रेम रखने वाले के लिये हित की इच्छा से कहूँगा।

न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः

अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः

na me viduḥ suragaṇāḥ prabhavaṃ na maharṣayaḥ|

ahamādirhi devānāṃ maharṣīṇāṃ ca sarvaśaḥ||

मेरी उत्पत्ति को अर्थात् लीला से प्रकट होने को न देवता लोग जानते हैं और न महर्षिजन ही जानते हैं, क्योंकि मैं सब प्रकार से देवताओं का और महर्षियों का भी आदि कारण हूँ।

यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्

असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते

yo māmajamanādiṃ ca vetti lokamaheśvaram|

asammūḍhaḥ sa martyeṣu sarvapāpaiḥ pramucyate||

जो मुझको अजन्मा अर्थात् वास्तव में जन्मरहित, अनादि और लोकों का महान् ईश्वर तत्त्व से जानता है, वह मनुष्यों में ज्ञानवान् पुरुष सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है।

बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः

सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च

buddhirjñānamasaṃmohaḥ kṣamā satyaṃ damaḥ śamaḥ|

sukhaṃ duḥkhaṃ bhavo'bhāvo bhayaṃ cābhayameva ca||

निश्चय करने की शक्ति, यथार्थ ज्ञान, असम्पूढता, क्षमा, सत्य, इन्द्रियों का वश में करना, मन का निग्रह तथा सुख-दुःख, उत्पत्ति-प्रलय और भय-अभय तथा नाना प्रकार के भाव मुझसे से होते हैं।

श्लोक 4–5

अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः

भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः

ahiṃsā samatā tuṣṭistapo dānaṃ yaśo'yaśaḥ|

bhavanti bhāvā bhūtānāṃ matta eva pṛthagvidhāḥ||

निश्चय करने की शक्ति, यथार्थ ज्ञान, असम्पूढता, क्षमा, सत्य, इन्द्रियों का वश में करना, मन का निग्रह तथा सुख-दुःख, उत्पत्ति-प्रलय और भय-अभय तथा नाना प्रकार के भाव मुझसे से होते हैं।

श्लोक 4–5

महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा

मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः

maharṣayaḥ sapta pūrve catvāro manavastathā|

madbhāvā mānasā jātā yeṣāṃ loka imāḥ prajāḥ||

सात महर्षिजन, चार उनसे भी पूर्व में होने वाले सनकादि तथा स्वायम्भुव आदि चौदह मनु—ये मुझमें भाव वाले सब-के-सब मेरे संकल्प से उत्पन्न हुए हैं, जिनकी संसार में यह सम्पूर्ण प्रजा है।

एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः

सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः

etāṃ vibhūtiṃ yogaṃ ca mama yo vetti tattvataḥ|

so'vikampena yogena yujyate nātra saṃśayaḥ||

जो पुरुष मेरी इस परमैश्वर्य रूप विभूति को और योग शक्ति को तत्त्व से जानता है, वह निश्चल भक्ति योग से युक्त हो जाता है—इसमें कुछ भी संशय नहीं है।

अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते

इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः

ahaṃ sarvasya prabhavo mattaḥ sarvaṃ pravartate|

iti matvā bhajante māṃ budhā bhāvasamanvitāḥ||

मैं वासुदेव ही सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति का कारण हूँ और मुझसे ही सब जगत् चेष्टा करता है—इस प्रकार दशन अध्याय समझकर श्रद्धा और भक्ति से युक्त बुद्धिमान् भक्तजन मुझ परमेश्वर को ही निरन्तर भजते हैं।

मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्

कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च

maccittā madgataprāṇā bodhayantaḥ parasparam|

kathayantaśca māṃ nityaṃ tuṣyanti ca ramanti ca||

निरन्तर मुझमें मन लगाने वाले और मुझ में ही प्राणों को अर्पण करने वाले भक्तजन मेरी भक्ति की चर्चा के द्वारा आपस में मेरे प्रभाव को जानते हुए तथा गुण और प्रभाव सहित मेरा कथन करते हुए ही निरन्तर सन्तुष्ट होते हैं और मुझ वासुदेव में ही निरन्तर रमण करते हैं।

तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्

ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते

teṣāṃ satatayuktānāṃ bhajatāṃ prītipūrvakam|

dadāmi buddhiyogaṃ taṃ yena māmupayānti te||

उन निरन्तर मेरे ध्यान आदि में लगे हुए और प्रेमपूर्वक भजने वाले भक्तों को मैं वह तत्त्व ज्ञान रूप योग देता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं।

तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः

नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता

teṣāmevānukampārthamahamajñānajaṃ tamaḥ|

nāśayāmyātmabhāvastho jñānadīpena bhāsvatā||

हे अर्जुन! उनके ऊपर अनुग्रह करने के लिये उनके अन्तःकरण में स्थित हुआ मैं स्वयं ही उनके अज्ञानजनित अन्धकार को प्रकाशमय तत्त्वज्ञान रूप दीपक के द्वारा नष्ट कर देता हूँ।

अर्जुन उवाच

परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्

पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्

arjuna uvāca

paraṃ brahma paraṃ dhāma pavitraṃ paramaṃ bhavān|

puruṣaṃ śāśvataṃ divyamādidevamajaṃ vibhum||

अर्जुन बोले—आप परम ब्रह्म, परम धाम और परम पवित्र हैं, क्योंकि आपको सब ऋषिगण सनातन, दिव्य पुरुष एवं देवों का भी आदि देव, अजन्मा और सर्वव्यापी कहते हैं। वैसे ही देवर्षि नारद तथा असित और देवल ऋषि तथा महर्षि व्यास भी कहते हैं और स्वयं आप भी मेरे प्रति कहते हैं।

श्लोक 12–13

आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा

असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे

āhustvāmṛṣayaḥ sarve devarṣirnāradastathā|

asito devalo vyāsaḥ svayaṃ caiva bravīṣi me||

अर्जुन बोले—आप परम ब्रह्म, परम धाम और परम पवित्र हैं, क्योंकि आपको सब ऋषिगण सनातन, दिव्य पुरुष एवं देवों का भी आदि देव, अजन्मा और सर्वव्यापी कहते हैं। वैसे ही देवर्षि नारद तथा असित और देवल ऋषि तथा महर्षि व्यास भी कहते हैं और स्वयं आप भी मेरे प्रति कहते हैं।

श्लोक 12–13

सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव

न हि ते भगवन् व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः

sarvametadṛtaṃ manye yanmāṃ vadasi keśava|

na hi te bhagavan vyaktiṃ vidurdevā na dānavāḥ||

हे केशव! जो कुछ भी मेरे प्रति आप कहते हैं, इस सबको मैं सत्य मानता हूँ। हे भगवान्! आपके लीलामय स्वरूप को न तो दानव जानते हैं और न देवता ही जानते हैं।

स्वयमेवात्मनाऽत्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम

भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते

svayamevātmanā'tmānaṃ vettha tvaṃ puruṣottama|

bhūtabhāvana bhūteśa devadeva jagatpate||

हे भूतों को उत्पन्न करने वाले! हे भूतों के ईश्वर! हे देवों के देव! हे जगत् के स्वामी! हे पुरुषोत्तम! आप स्वयं ही अपने से अपने को जानते हैं।

वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः

याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि

vaktumarhasyaśeṣeṇa divyā hyātmavibhūtayaḥ|

yābhirvibhūtibhirlokānimāṃstvaṃ vyāpya tiṣṭhasi||

इसलिये आप ही उन अपनी दिव्य विभूतियों को सम्पूर्णता से कहने में समर्थ हैं, जिन विभूतियों के द्वारा आप इन सब लोकों को व्याप्त करके स्थित हैं।

कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्

केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया

kathaṃ vidyāmahaṃ yogiṃstvāṃ sadā paricintayan|

keṣu keṣu ca bhāveṣu cintyo'si bhagavanmayā||

हे योगेश्वर! मैं किस प्रकार निरन्तर चिन्तन करता हुआ आपको जानूँ और हे भगवान्! आप किन-किन भावों में मेरे द्वारा चिन्तन करने योग्य हैं?

विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन

भूयः कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्

vistareṇātmano yogaṃ vibhūtiṃ ca janārdana|

bhūyaḥ kathaya tṛptirhi śrṛṇvato nāsti me'mṛtam||

हे जनार्दन! अपनी योग शक्ति को और विभूति को फिर भी विस्तारपूर्वक कहिये, क्योंकि आपके अमृतमय वचनों को सुनते हुए मेरी तृप्ति नहीं होती अर्थात् सुनने की उत्कण्ठा बनी ही रहती है।

श्री भगवानुवाच

हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः

प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे

śrī bhagavānuvāca

hanta te kathayiṣyāmi divyā hyātmavibhūtayaḥ|

prādhānyataḥ kuruśreṣṭha nāstyanto vistarasya me||

श्रीभगवान् बोले—हे कुरुश्रेष्ठ! अब मैं जो मेरी दिव्य विभूतियाँ हैं, उनको तेरे लिये प्रधानता से कहूँगा; क्योंकि मेरे विस्तार का अन्त नहीं है।

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः

अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च

ahamātmā guḍākeśa sarvabhūtāśayasthitaḥ|

ahamādiśca madhyaṃ ca bhūtānāmanta eva ca||

हे अर्जुन! मैं सब भूतों के हृदय में स्थित सबका आत्मा हूँ तथा सम्पूर्ण भूतों का आदि, मध्य और अन्त भी मैं ही हूँ।

आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्

मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी

ādityānāmahaṃ viṣṇurjyotiṣāṃ raviraṃśumān|

marīcirmarutāmasmi nakṣatrāṇāmahaṃ śaśī||

मैं अदिति के बारह पुत्रों में विष्णु और ज्योतियों में किरणों वाला सूर्य हूँ तथा मैं उनचास वायुदेवताओं में मरीचि नामक वायुदेवता और नक्षत्रों का अधिपति चन्द्रमा हूँ।

वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः

इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना

vedānāṃ sāmavedo'smi devānāmasmi vāsavaḥ|

indriyāṇāṃ manaścāsmi bhūtānāmasmi cetanā||

मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में इन्द्र हूँ, इन्द्रियों में मन हूँ और भूत प्राणियों की चेतना अर्थात् जीवनी शक्ति हूँ।

रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्

वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्

rudrāṇāṃ śaṅkaraścāsmi vitteśo yakṣarakṣasām|

vasūnāṃ pāvakaścāsmi meruḥ śikhariṇāmaham||

मैं एकादश रुद्रों में शंकर हूँ और यक्ष तथा राक्षसों में धन का स्वामी कुबेर हूँ। मैं आठ वसुओं में अग्नि हूँ और शिखर वाले पर्वतों में सुमेरु पर्वत हूँ।

पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्

सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः

purodhasāṃ ca mukhyaṃ māṃ viddhi pārtha bṛhaspatim|

senānīnāmahaṃ skandaḥ sarasāmasmi sāgaraḥ||

पुरोहितों में मुखिया बृहस्पति मुझको जान। हे पार्थ! मैं सेनापतियों में स्कन्द और जलाशयों में समुद्र हूँ।

महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्

यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः

maharṣīṇāṃ bhṛgurahaṃ girāmasmyekamakṣaram|

yajñānāṃ japayajño'smi sthāvarāṇāṃ himālayaḥ||

मैं महर्षियों में भृगु और शब्दों में एक अक्षर अर्थात् ओंकार हूँ। सब प्रकार के यज्ञों में जपयज्ञ और स्थिर रहने वालों में हिमालय पहाड़ हूँ।

अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः

गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः

aśvatthaḥ sarvavṛkṣāṇāṃ devarṣīṇāṃ ca nāradaḥ|

gandharvāṇāṃ citrarathaḥ siddhānāṃ kapilo muniḥ||

मैं सब वृक्षों में पीपल का वृक्ष, देवर्षियों में नारद मुनि, गन्धर्वों में चित्ररथ और सिद्धों में कपिल मुनि हूँ।

उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम्

ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्

uccaiḥśravasamaśvānāṃ viddhi māmamṛtodbhavam|

airāvataṃ gajendrāṇāṃ narāṇāṃ ca narādhipam||

घोड़ों में अमृत के साथ उत्पन्न होने वाला उच्चैःश्रवा नामक घोड़ा, श्रेष्ठ हाथियों में ऐरावत नामक हाथी और मनुष्यों में राजा मुझको जान।

आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्

प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः

āyudhānāmahaṃ vajraṃ dhenūnāmasmi kāmadhuk|

prajanaścāsmi kandarpaḥ sarpāṇāmasmi vāsukiḥ||

मैं शस्त्रों में वज्र और गौओं में कामधेनु हूँ। शास्त्रोक्त रीति से सन्तान की उत्पत्ति का हेतु कामदेव हूँ, और सर्पों में सर्पराज वासुकि हूँ।

अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्

पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्

anantaścāsmi nāgānāṃ varuṇo yādasāmaham|

pitṝṇāmaryamā cāsmi yamaḥ saṃyamatāmaham||

मैं नागों में शेष नाग और जलचरों का अधिपति वरुण देवता हूँ और पितरों में अर्यमा नामक पितर तथा शासन करने वालों में यमराज मैं हूँ।

प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्

मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्

prahlādaścāsmi daityānāṃ kālaḥ kalayatāmaham|

mṛgāṇāṃ ca mṛgendro'haṃ vainateyaśca pakṣiṇām||

मैं दैत्यों में प्रह्लाद और गणना करने वालों का समय हूँ तथा पशुओं में मृगराज सिंह और पक्षियों में गरुड हूँ।

पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्

झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी

pavanaḥ pavatāmasmi rāmaḥ śastrabhṛtāmaham|

jhaṣāṇāṃ makaraścāsmi srotasāmasmi jāhnavī||

मैं पवित्र करने वालों में वायु और शस्त्रधारियों में श्रीराम हूँ तथा मछलियों में मगर हूँ और नदियों में श्रीभागीरथी गंगाजी हूँ।

सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन

अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्

sargāṇāmādirantaśca madhyaṃ caivāhamarjuna|

adhyātmavidyā vidyānāṃ vādaḥ pravadatāmaham||

हे अर्जुन! सृष्टियों का आदि और अन्त तथा मध्य भी मैं ही हूँ। मैं विद्याओं में अध्यात्मविद्या अर्थात् ब्रह्म विद्या और परस्पर विवाद करने वालों का तत्त्वनिर्णय के लिये किया जाने वाला वाद हूँ।

अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च

अहमेवाक्षयः कालो धाताऽहं विश्वतोमुखः

akṣarāṇāmakāro'smi dvandvaḥ sāmāsikasya ca|

ahamevākṣayaḥ kālo dhātā'haṃ viśvatomukhaḥ||

मैं अक्षरों में अकार हूँ और समासों में द्वन्द्वनामक समास हूँ। अक्षय काल अर्थात् काल का भी महाकाल तथा सब ओर मुखवाला, विराट् स्वरूप, सबका धारण-पोषण करने वाला भी मैं ही हूँ।

मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्

कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा

mṛtyuḥ sarvaharaścāhamudbhavaśca bhaviṣyatām|

kīrtiḥ śrīrvākca nārīṇāṃ smṛtirmedhā dhṛtiḥ kṣamā||

मैं सबका नाश करने वाला मृत्यु और उत्पन्न होने वालों का उत्पत्ति हेतु हूँ तथा स्त्रियों में कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ।

बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्

मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः

bṛhatsāma tathā sāmnāṃ gāyatrī chandasāmaham|

māsānāṃ mārgaśīrṣo'hamṛtūnāṃ kusumākaraḥ||

तथा गायन करने योग्य श्रुतियों में मैं बृहत्साम और छन्दों में गायत्री छन्द हूँ तथा महीनों में मार्गशीर्ष और ऋतुओं में वसन्त मैं हूँ।

द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्

जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्

dyūtaṃ chalayatāmasmi tejastejasvināmaham|

jayo'smi vyavasāyo'smi sattvaṃ sattvavatāmaham||

मैं छल करने वालों में जूआ और प्रभावशाली पुरुषों का प्रभाव हूँ। मैं जीतने वालों का विजय हूँ, निश्चय करने वालों का निश्चय और सात्त्विक पुरुषों का सात्त्विक भाव हूँ।

वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनंजयः

मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः

vṛṣṇīnāṃ vāsudevo'smi pāṇḍavānāṃ dhanaṃjayaḥ|

munīnāmapyahaṃ vyāsaḥ kavīnāmuśanā kaviḥ||

वृष्णिवंशियों में वासुदेव अर्थात् मैं स्वयं तेरा सखा, पाण्डवों में धनञ्जय अर्थात् तू, मुनियों में वेदव्यास और कवियों में शुक्राचार्य कवि भी मैं ही हूँ।

दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्

मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्

daṇḍo damayatāmasmi nītirasmi jigīṣatām|

maunaṃ caivāsmi guhyānāṃ jñānaṃ jñānavatāmaham||

मैं दमन करने वालों का दण्ड अर्थात् दमन करने की शक्ति हूँ, जीतने की इच्छा वालों की नीति हूँ, गुप्त रखने योग्य भावों का रक्षक मौन हूँ और ज्ञानवानों का तत्त्व ज्ञान मैं ही हूँ।

यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन

न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्

yaccāpi sarvabhūtānāṃ bījaṃ tadahamarjuna|

na tadasti vinā yatsyānmayā bhūtaṃ carācaram||

और हे अर्जुन! जो सब भूतों की उत्पत्ति का कारण है, वह भी मैं ही हूँ; क्योंकि ऐसा चर और अचर कोई भी भूत नहीं है, जो मुझसे रहित हो।

नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परंतप

एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया

nānto'sti mama divyānāṃ vibhūtīnāṃ paraṃtapa|

eṣa tūddeśataḥ prokto vibhūtervistaro mayā||

हे परंतप! मेरी दिव्य विभूतियों का अन्त नहीं है, मैंने अपनी विभूतियों का यह विस्तार तो तेरे लिये एकदेश से अर्थात् संक्षेप से कहा है।

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा

तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसंभवम्

yadyadvibhūtimatsattvaṃ śrīmadūrjitameva vā|

tattadevāvagaccha tvaṃ mama tejoṃ'śasaṃbhavam||

जो-जो भी विभूति युक्त अर्थात् ऐश्वर्य युक्त, कान्ति युक्त और शक्ति युक्त वस्तु है, उस-उसको तू मेरे तेज के अंश की ही अभिव्यक्ति जान।

अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन

विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्

athavā bahunaitena kiṃ jñātena tavārjuna|

viṣṭabhyāhamidaṃ kṛtsnamekāṃśena sthito jagat||

अथवा हे अर्जुन! इस बहुत जानने से तेरा क्या प्रयोजन है। मैं इस सम्पूर्ण जगत् को अपनी योग शक्ति के एक अंशमात्र से धारण करके स्थित हूँ।

अध्याय दीया: unlit

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विभूति योग

Vibhūti Yoga · विभूतियोग

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