भगवद्गीता · अध्याय 10 · Vibhūti Yoga
रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्
rudrāṇāṃ śaṅkaraścāsmi vitteśo yakṣarakṣasām|
vasūnāṃ pāvakaścāsmi meruḥ śikhariṇāmaham||
शब्दार्थ
रुद्राणाम् = रुद्रोंमें
शङ्करः = शंकर
च = और
यक्षरक्षसाम् = यक्ष-राक्षसोंमें
वित्तेशः = कुबेर
अस्मि = मैं हूँ।
वसूनाम् = वसुओंमें
पावकः = पवित्र करनेवाली अग्नि
च = और
शिखरिणाम् = शिखरवाले पर्वतोंमें
मेरुः = सुमेरु
अहम् = मैं
अस्मि = हूँ।
अनुवाद
मैं एकादश रुद्रों में शंकर हूँ और यक्ष तथा राक्षसों में धन का स्वामी कुबेर हूँ। मैं आठ वसुओं में अग्नि हूँ और शिखर वाले पर्वतों में सुमेरु पर्वत हूँ।
टीका
इस श्लोक के चारों ओर विराजमान टीकाकार

आदि शंकराचार्य · अद्वैत
हिंदी
श्री ज्ञानेश्वर · वारकरी
हिंदी(10.225) सम्पूर्ण रुद्रों में मदन के शत्रु जो शंकर हैं, सो मैं हूँ; इस में कुछ सन्देह मत रक्खो।
(10.226) श्रीअनन्त कहते हैं कि यक्ष और राक्षसगणों में शंकर का मित्र जो धनवान कुबेर है वह मैं हूँ।
(10.227) आठों वसुओं में जो अग्नि है वह मैं हूँ और शिखरवान्

श्री उड़िया बाबा · आधुनिक
हिंदीभावार्थ— मैं एकादश रुद्रों में शंकर हूँ, यक्ष-राक्षसों में कुबेर हूँ, आठ वसुओं में अग्नि हूँ, और पर्वतों में मेरु हूँ।
स्वामी रामसुखदास · आधुनिक
हिंदी‘रुद्राणां शङ्करश्चास्मि’—हर, बहुरूप, त्र्यम्बक आदि ग्यारह रुद्रोंमें शम्भु अर्थात् शंकर सबके अधिपति हैं। ये कल्याण प्रदान करनेवाले और कल्याणस्वरूप हैं। इसलिये भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है।
‘वित्तेशो यक्षरक्षसाम्’—कुबेर यक्ष तथा राक्षसोंके अधिपति हैं और इनको धनाध्यक्षके पदपर नियुक्त किया गया है। सब यक्ष-राक्षसोंमें मुख्य होनेसे ये भगवान्की विभूति हैं।
‘वसूनां पावकश्चास्मि’—धर, ध्रुव, सोम आदि आठ
वसुओंमें अनल अर्थात् पावक (अग्नि) सबके अधिपति हैं। ये सब देवताओंको यज्ञकी हवि पहुँचानेवाले तथा भगवान्के मुख हैं। इसलिये इनको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है।
‘मेरु: शिखरिणामहम्’—सोने, चाँदी, ताँबे आदिके शिखरवाले जितने पर्वत हैं, उनमें सुमेरु पर्वत मुख्य है।
यह सोने तथा रत्नोंका भण्डार है। इसलिये भगवान्ने इसको अपनी विभूति बताया है।
इस श्लोकमें जो चार विभूतियाँ कही हैं, उनमें जो कुछ विशेषता—महत्ता दीखती है, वह विभूतियोंके मूलरूप परमात्मासे ही आयी है। अतः इन विभूतियोंमें परमात्माका ही चिन्तन होना चाहिये।
पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्।

आदि शंकराचार्य · अद्वैत
संस्कृतरुद्राणाम् एकादशानां शङ्करह् च अस्मि । वित्तेशः कुबेरः यक्ष-रक्षसां यक्षाणां रक्षसां च । वसूनां अष्टानां पावकह् च अस्मि अग्निः । मेरुः शिखरिणां शिखर-वतां अहम् ॥

श्री रामानुज · विशिष्टाद्वैत
अंग्रेज़ीLord Krishna reveals of the 11 Rudras or expansions of destruction, His vibhūti or divine, transcendental opulence is Śankara a name for Shiva and of the 8 Vasus His vibhūti is Pāvaka which is Agni the fire-god.

श्री मध्वाचार्य · द्वैत
संस्कृतअंग्रेज़ीश्लोक 10.21–10.25 पर
“विष्णुः सर्वव्याप्तित्वप्रवेशित्वादेः | विष्णु व्याप्तौ | विश प्रवेशने इति हि पठन्ति || गतिश्च सर्वभूतानां प्रजानां चापि भारत | व्याप्तौ मे रोदसि पार्थ कान्तिश्चाभ्यधिका मम | अधिभूतानिविष्टश्च तदिच्छुश्चापि भारत | क्रमणाच्चाप्यहं पार्थ विष्णुरित्यभिसंज्ञितः | इति मोक्षधर्मे ||” - Vishnu, because He pervades, entering the entire space. Vishnu means all-pervading, Visha entering, thus also it is said. “I am the goal for all the creatures and the conscious beings, O Bharata. By Me is the world and the sky enveloped, O Partha and My glory is immeasurable. Abiding in all creatures, I desire their well-being. Because of My strident steps I am called Vishnu”, thus in Moksha Dharma text.

श्री ज्ञानेश्वर · वारकरी
मराठीअशेषांही रुद्रांमाझारीं । शंकर जो मदनारी । तो मी येथ न धरीं । भ्रांति कांहीं ॥ २२५ ॥
यक्षरक्षोगणांआंतु । शंभूचा सखा जो धनवंतु । तो कुबेरु मी हें अनंतु । म्हणता जाहला ॥ २२६ ॥
मग आठांही वसूंमाझारीं । पावकु तो मी अवधारीं । शिखराथिलियां सर्वोपरी । मेरु तो मी ॥ २२७ ॥

श्री ज्ञानेश्वर · वारकरी
अंग्रेज़ी23 *“Of the Rudras I am Saṅkara, and (Kubera), the Lord of Wealth of the Yakṣas and Rākṣases; and of the Vasus I am Pāvaka, and I the Meru of the crested crags.”* (225) "Amongst the fourteen Rudras, I am Shankara, the enemy of cupid, do not doubt it. I am Kubera, the wealthy friend of Shambhu (God Shiva) amongst Yaksha-Rākshas order of spirits," said Ananta. "I am Pāvaka (fire) amongst the eight Vasus, and I am also the Meru amongst the (seven) mountain-peaks."
स्वामी रामसुखदास · आधुनिक
अंग्रेज़ी'Rudrāṇām śaṅkaraścāsmi'—Śaṅkara is the lord of all the eleven Rudras, named Hara, Bahurūpa and Tryambaka etc. They are the bestowers of beatitude, to others. So Śaṅkara is said to be the Lord's divine glory.
'Vitteso yaksarakṣasām'—Kubera, is the lord of genies and demons. He is also the lord of fabulous wealth, so he is called a Lord's divine glory.
'Vastinām pāvakaścāsmi'—The god of fire, is the lord of eight Vasus, named Dhara, Dhruva and Soma etc. The god of fire, is said to be the mouth of the Lord through which oblation reaches the deities. So he is a Lord's divine glory.
'Meruḥ śikhariṇāmaham'—Of all the mountains, having mounts of gold, silver and copper etc., the golden Meru mountain, is the most important. It is the storehouse of jewels and diamonds. So, this mountain is, His glory.
Whatever distinction, these divine glories have, is the Lord's. So only He, should be thought of, in all these glories.
एकादश रुद्रोंमें मैं शंकर हूँ। यक्ष और राक्षसोंमें मैं धनेश्वर कुबेर हूँ। आठ वसुओंमें मैं पावक—अग्नि हूँ। शिखरवालोंमें (पर्वतोंमें) मैं सुमेरु पर्वत हूँ