कृष्ण का उत्तर: अभ्यास और वैराग्य
श्री भगवानुवाच असंशयं
महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं
श्रीभगवान् बोले-हे महाबाहो! निःसन्देह मन चञ्चल और कठिनता से वश में होने वाला है; परंतु हे कुन्ती पुत्र अर्जुन! यह अभ्यास और वैराग्य से वश में होता है।
अवधारणाएँ
अभ्यासः
abhyāsaḥ
अभि (की ओर) और √अस् (फेंकना) से — मन को बार-बार एक ही बिंदु की ओर फेंकना; अभ्यास। कृष्ण का उत्तर (6.35) इसे वैराग्य के साथ जोड़ देता है।
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्
॥ ६.३४ ॥
क्योंकि हे श्रीकृष्ण! यह मन बड़ा चञ्चल, प्रमथन स्वभाव वाला, बड़ा दृढ़ और बलवान् है। इसलिये उसका वश में करना मैं वायु के रोकने की भाँति अत्यन्त दुष्कर मानता हूँ।
संदर्भ में पढ़ेंअर्जुन की शिकायत हर साधक की शिकायत है: मन को थामना वायु को थामने जितना कठिन है। कृष्ण न तो इसे झुठलाते हैं, न कोई नुस्ख़ा थमाते हैं — वे दो साधन बताते हैं, अभ्यास और वैराग्य, और हर टीकाकार इस जोड़ी को एक सच्ची विधि की तरह लेता है, कोई सतही उपदेश समझकर नहीं।
कृष्ण का उत्तर: अभ्यास और वैराग्य
श्री भगवानुवाच असंशयं
महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं
श्रीभगवान् बोले-हे महाबाहो! निःसन्देह मन चञ्चल और कठिनता से वश में होने वाला है; परंतु हे कुन्ती पुत्र अर्जुन! यह अभ्यास और वैराग्य से वश में होता है।
मन जहाँ-जहाँ भटके, उसे लौटा लाओ
यतो यतो निश्चरति
मनश्चञ्चलमस्थिरम्
यह स्थिर न रहने वाला और चञ्चल मन जिस-जिस शब्दादि विषय के निमित्त से संसार में विचरता है, उस विषय से रोककर यानी हटाकर इसे बार-बार परमात्मा में निरुद्ध करे।
दृढ़ निश्चय से, बिना खिन्न हुए, साधा गया
तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं
योगसंज्ञितम्
जो दुःख रूप संसार के संयोग से रहित है तथा जिसका नाम योग है, उसको जानना चाहिये। वह योग न उकताये हुए अर्थात् धैर्य और उत्साह युक्त चित्त से निश्चयपूर्वक करना कर्तव्य है।
धीरे-धीरे, और दो चीज़ों के साथ-साथ चलने से — कृष्ण का पूरा उत्तर बस इतना है। अभ्यास: मन को उसी बिंदु पर लौटाते रहिए, बार-बार, बहुत समय तक। वैराग्य: जिन चीज़ों की ओर वह भागता है, उन्हें उसे परोसना बंद कर दीजिए। मन वायु है — अर्जुन की इस शिकायत से कोई असहमत नहीं; शंकराचार्य, रामानुज और ज्ञानेश्वर सब इसे स्वीकारते हैं, और कोई नुस्ख़ा नहीं देता। रामानुज सबसे काम की बात जोड़ते हैं: मन वहीं ठहरता है जिससे उसे प्रेम हो जाए, इसलिए उसे लौटने को कुछ ऐसा दीजिए जो प्रेम के योग्य हो।

आदि शंकराचार्य · अद्वैत
शंकराचार्य दोनों शब्दों को एक शिल्पी की सूक्ष्मता से परिभाषित करते हैं — एक ही प्रत्यय की आवृत्ति, और इस लोक या परलोक के हर भोग के प्रति वितृष्णा।
अभ्यासो नाम चित्तभूमौ कस्याञ्चित् समानप्रत्ययावृत्तिः चित्तस्य । वैराग्यं नाम … वैतृष्ण्यम् — practice is the mind's returning again and again to the same cognition on one ground; dispassion is thirstlessness toward enjoyments seen and unseen.
Śaṅkara Bhāṣya on 6.35 (Sanskrit, GitaDeep corpus; working rendering under review)

श्री रामानुज · विशिष्टाद्वैत
रामानुज की विधि है प्रेम: मन वही थामता है जिससे वह प्रेम करना सीख जाए, इसलिए उसे प्रतिदिन टिकने को आत्मा का सौंदर्य दीजिए।
But the possibility of taming it depends upon generating in the mind a feeling of affection and attachment by accustoming the mind regularly reflect on the sublime, transcendental qualities of the ātma or soul and then meditating upon the ātma daily.
Gītā-bhāṣya on 6.35 — English translation (GitaDeep corpus)

श्री मध्वाचार्य · द्वैत
मध्व के लिए यह श्लोक दोनों ओर से अक्षरशः सत्य है — इस जोड़ी के बिना स्थिरता संभव ही नहीं।
Because of the restlessness of the mind and in the absence of practice and renunciation, the firmly established state of equanimity is surely not possible”, thus in Vyas Yoga.
Madhva Bhāṣya on 6.35 — English translation (GitaDeep corpus)

श्री ज्ञानेश्वर · वारकरी
ज्ञानेश्वरी मन को उसका स्वभाव — चंचलता — दे देती है, और फिर भी स्थिरता को साधने योग्य बताती है।
The mind is certainly so. To be fickle is the very nature of the mind. But if it is given the strength of indifference to worldly life, and turned in the direction of the study of 'Yoga' discipline, then it could be steadied after some time.
Jñāneśvarī on 6.35, tr. R. K. Bhagwat (GitaDeep corpus)
जहाँ परंपराएँ भिन्न हैं, हम वह अंतर दिखाते हैं।