भगवद्गीता · अध्याय 15 · Puruṣottama Yoga

गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा

पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः

15.12

॥ १५.१३ ॥

15.14

gāmāviśya ca bhūtāni dhārayāmyahamojasā|puṣṇāmi cauṣadhīḥ sarvāḥ somo bhūtvā rasātmakaḥ||

0:00 / 0:11

शब्दार्थ

अहम् = मैं

च = ही

गाम् = पृथ्वीमें

आविश्य = प्रविष्ट होकर

ओजसा = अपनी शक्तिसे

भूतानि = समस्त प्राणियोंको

धारयामि = धारण करता हूँ

च = और (मैं ही)

रसात्मकः = रसस्वरूप

सोमः = चन्द्रमा

भूत्वा = होकर

सर्वाः = समस्त

औषधीः = औषधियों (वनस्पतियों)-को

पुष्णामि = पुष्ट करता हूँ।

अनुवाद

और मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सब भूतों को धारण करता हूँ और रस स्वरूप अर्थात् अमृतमय चन्द्रमा होकर सम्पूर्ण ओषधियों को अर्थात् वनस्पतियों को पुष्ट करता हूँ।

टीका

इस श्लोक के चारों ओर विराजमान टीकाकार

पहले खोलें:
भाषा:
आदि शंकराचार्य का चित्र

आदि शंकराचार्य · अद्वैत

हिंदी

मैं पृथिवीमें प्रविष्ट होकर अपने उस बलसे, जो कि कामना और आसक्तिसे रहित मेरा ऐश्वर्य-बल जगत्को धारण करनेके लिये पृथिवीमें प्रविष्ट है, जिस बलके कारण भारवती पृथिवी नीचे नहीं गिरती और फटती भी नहीं, सारे जगत्को धारण करता हूँ।

यही बात वेदमन्त्र भी कहते हैं कि ‘जिससे घुलोक और भारवती पृथिवी दृढ़ है’ तथा ‘वह पृथिवीको धारण करता है’ इत्यादि। अतः यह कहना ठीक ही है कि मैं पृथिवीमें प्रविष्ट होकर चराचर समस्त भूतप्राणियोंको धारण करता हूँ।

तथा मैं ही रसस्वरूप चन्द्रमा होकर पृथिवीमें उत्पन्न होनेवाली धान, जो आदि समस्त ओषधियोंका पोषण करता हूँ अर्थात् उनको पुष्ट और स्वादयुक्त किया करता हूँ। जो सब रसोंका आत्मा है, रस ही जिसका स्वभाव है, जो समस्त रसोंकी खानि है वह सोम है, वही अपने रसका सञ्चार करके समस्त वनस्पतियोंका पोषण किया करता है

श्री ज्ञानेश्वर का चित्र

श्री ज्ञानेश्वर · वारकरी

हिंदी

(15.401) भूतल में मैंने ही प्रवेश किया है। इसी से समुद्र के महाजल में भी यह पृथ्वीरूपी रजःकणों का ढेला नहीं गलता

(15.402) और पृथ्वी जो अपार चराचर भूतमात्र को धारण करती है सो मैं ही उसमें प्रवेश कर धारण करता हूँ।

(15.403) गगन में भी हे पाण्डुसुत! मैं चन्द्रमा के रूप से एक चलता हुआ अमृत का सरोवर ही भरा हुआ हूँ।

(15.404) उसमें से जो किरणें निकलती हैं, उनसे मैं ही अनन्त रस-प्रवाहों के द्वारा सम्पूर्ण औषधियों का कोश भरता हूँ। (15.405) इस प्रकार मैं सकल धान इत्यादि धान्यमात्र का सुकाल करता हूँ तथा सम्पूर्ण प्राणियों को अन्न द्वारा जीवन देता हूँ।

(15.406) अन्न पकाया जाता है परन्तु जिससे उसे पचाकर जीव समाधान का भोग ले वह दीपन यों ही कैसे हो सकता है?

श्री उड़िया बाबा का चित्र

श्री उड़िया बाबा · आधुनिक

हिंदी

भावार्थ— मैं पृथ्वी में प्रविष्ट होकर अपनी शक्ति से सब प्राणियों को धारण करता हूँ तथा अमृतमय चन्द्रमा होकर सम्पूर्ण औषधियों का पोषण करता हूँ।

व्याख्या— जिस प्रकार जल और वायु दो वस्तुएँ नहीं है, जल को बादल रूप में वायु धारण किये रहता है, उसी प्रकार सम्पूर्ण प्राणियों को मैं धारण किये हुए हूँ और उनसे तत्त्वतः भिन्न भी नहीं हूँ।

स्वामी रामसुखदास · आधुनिक

हिंदी

'गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा'—भगवान् ही पृथ्वीमें प्रवेश करके उसपर स्थित सम्पूर्ण स्थावर-जंगम प्राणियोंको धारण करते हैं। तात्पर्य यह है कि पृथ्वीमें जो धारण-शक्ति देखनेमें आती है, वह पृथ्वीकी अपनी न होकर भगवान्की ही है।

वैज्ञानिक भी इस बातको स्वीकार करते हैं कि पृथ्वीकी अपेक्षा जलका स्तर ऊँचा है और पृथ्वीपर जलका भाग स्थलकी अपेक्षा बहुत अधिक है। ऐसा होनेपर भी पृथ्वी जलमग्न नहीं होती—यह भगवान्की

धारण-शक्तिका ही प्रभाव है।

पृथ्वीके उपलक्षणसे यह समझना चाहिये कि पृथ्वीके सिवाय जहाँ भी धारण-शक्ति देखनेमें आती है, वह सब भगवान्की ही है। पृथ्वीमें अन्नादि औषधियोंको उत्पन्न करनेकी (उत्पादिका) शक्ति एवं गुरुत्वाकर्षण-शक्ति भी भगवान्की ही समझनी चाहिये।

'पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः'—चन्द्रमामें दो शक्तियाँ हैं—प्रकाशिका-शक्ति और पोषण-शक्ति। प्रकाशिका शक्तिमें अपने प्रभावका वर्णन

१-(१) छीः सचन्द्रार्कनक्षत्रा खं दिशो भूर्भृहोदधिः। वासुदेवस्य वीर्येण विधृतानि महात्मनः ॥

(महाभारत, अनु० १४१। १३४)

'स्वर्ग, सूर्य, चन्द्र तथा नक्षत्रसहित आकाश, दस दिशाएँ, पृथ्वी और महासागर—ये सब भगवान् वासुदेवकी शक्तिसे धारण किये हुए हैं।'

(२) पृथिव्यां तिष्ठन् यो यमयति महीं वेद न धरा यमित्यादी वेदो वदति जगतामीशममलम्।

नियन्तारं ध्येयं मुनिसुरनृणां मोक्षदमसी शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः ॥

(शङ्कराचार्यकृत कृष्णाष्टकम्)

'पृथ्वीमें रहकर जो पृथ्वीका नियमन करते हैं, परन्तु पृथ्वी जिनको नहीं जानती; 'यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथ्वीं यमयति यं पृथिवी न वेद' आदि श्रुतियोंसे वेद जिन अमलस्वरूपको जगत्का स्वामी, नियामक, ध्येय और देवता, मनुष्य तथा मुनिजनोंको मोक्ष देनेवाला बताता है, वे शरणागतवत्सल निखिल भुवनेश्वर श्रीकृष्णचन्द्र मेरे नेत्रोंके विषय हों।'

२-पृथ्वीपर जलका कुल भाग लगभग इकहत्तर प्रतिशत और स्थलका कुल भाग लगभग उन्तीस प्रतिशत माना जाता है।

पूर्वश्लोकमें करनेके बाद अब भगवान् इस श्लोकमें चन्द्रमाकी पोषण-शक्तिमें अपना प्रभाव बताते हैं कि चन्द्रमाके माध्यमसे सम्पूर्ण वनस्पतियोंको मैं ही पुष्ट करता हूँ।

चन्द्रमा शुक्लपक्षमें पोषक और कृष्णपक्षमें शोषक होता है। शुक्लपक्षमें रसमय चन्द्रमाकी मधुर किरणोंसे अमृत-वर्षा होनेके कारण ही लता-वृक्षादि पुष्ट होते हैं और फलते-फूलते हैं। माताके उदरमें स्थित शिशु भी शुक्लपक्षमें वृद्धिको प्राप्त होता है।

यहाँ 'सोमः' पद चन्द्रलोकका वाचक है, चन्द्रमण्डलका नहीं। नेत्रोंसे हमें जो दीखता है, वह चन्द्रमण्डल है। चन्द्रमण्डलसे भी ऊपर (आँखोंसे न दीखनेवाला) चन्द्रलोक

है। उपर्युक्त पदोंमें विशेषरूपसे 'सोमः' पद देनेका अभिप्राय यह है कि चन्द्रमामें प्रकाशके साथ-साथ अमृत-वर्षाकी शक्ति भी है। वह अमृत पहले चन्द्रलोकसे चन्द्रमण्डलमें आता है और फिर चन्द्रमण्डलसे भूमण्डलपर आता है।

यहाँ 'औषधीः' पदके अन्तर्गत गेहूँ, चना आदि सब प्रकारके अन्न समझने चाहिये। चन्द्रमाके द्वारा पुष्ट हुए अन्नका भोजन करनेसे ही मनुष्य, पशु, पक्षी आदि समस्त प्राणी पुष्टि प्राप्त करते हैं। औषधियों, वनस्पतियोंमें शरीरको पुष्ट करनेकी जो शक्ति है, वह चन्द्रमासे आती है। चन्द्रमाकी वह पोषण-शक्ति भी उसकी अपनी न होकर भगवान्की ही है। भगवान् ही चन्द्रमाको निमित्त बनाकर सबका पोषण करते हैं।

**परिशिष्ट भाव—**पृथ्वी, चन्द्रमा आदि सब भगवान्की अपरा प्रकृति है (गीता—सातवें अध्यायका चौथा श्लोक)। अतः इसके धारक, उत्पादक, पालक, संरक्षक, प्रकाशक आदि सब कुछ भगवान् ही हैं। भगवान्की शक्ति होनेसे अपरा प्रकृति भगवान्से अभिन्न है।

यहाँ 'सोम' शब्द चन्द्रलोकका वाचक है, जो सूर्यसे भी ऊपर है।

**सम्बन्ध—**समष्टि-शक्तिमें अपना प्रभाव बतानेके बाद अब भगवान् जिस शक्तिसे व्यष्टि-जगत्में क्रियाएँ हो रही हैं, उस व्यष्टि-शक्तिमें अपना प्रभाव बताते हैं।

आदि शंकराचार्य का चित्र

आदि शंकराचार्य · अद्वैत

संस्कृत

गां पृथिवीं आविश्य प्रविश्य धारयामि भूतानि जगत् अहं ओजसा बलेन; यत् बलं कामरागविवर्जितं ऐश्वरं रूपं जगद्विधारणाय पृथिव्यां आविष्टं येन पृथिवी गुर्वी न अधः पतति न विदीर्यते च । तथा च मन्त्रवर्णः -- ''येन द्यौरुग्रा पृथिवी च दृढा'' (तै. सं. ४-१-८) इति, ''स दाधार पृथिवीम्'' (तै. सं. ४-१-८) इत्यादिश्च । अतः गामाविश्य च भूतानि चराचराणि धारयामि इति युक्तमुक्तम् । किञ्च, पृथिव्यां जाताः ओषधीः सर्वाः व्रीहियवाद्याः पुष्णामि पुष्टिमतीः रसस्वादुमतीश्च करोमि सोमो भूत्वा रसात्मकः सोमः सन् रसात्मकः रसस्वभावः । सर्वरसानां आकरः सोमः । स हि सर्वरसात्मकः सर्वाः ओषधीः स्वात्मरसान् अनुप्रवेश्यन् पुष्णाति ॥ किञ्च --

श्री रामानुज का चित्र

श्री रामानुज · विशिष्टाद्वैत

अंग्रेज़ी

The word gām means earth and denotes the Earth. The word ojas means indomitable potency.

Lord Krishna enters into every atom of the Earth by this potency and supports all mobile and stationary jīvas or embodied beings by this potency.

He also manifests the energy of the moon whose nature is ambrosial and which nourishes all plants, vegetables, fruits and herbs, yielding crops such as rice and grains.

श्री मध्वाचार्य का चित्र

श्री मध्वाचार्य · द्वैत

मध्व भाष्यसंस्कृतअंग्रेज़ी

“गाम् भूमीम्” – गाम् means Earth.

श्री मध्वाचार्य का चित्र

श्री मध्वाचार्य · द्वैत

गीता तात्पर्य निर्णयसंस्कृतअंग्रेज़ी

“सौम्यत्वात् सोमनामाऽसौ सोममण्डलगः सदा |” – Sri Hari enjoys the propitious ones established. नि तर्हि गमन् क मण्डम्.

श्री ज्ञानेश्वर का चित्र

श्री ज्ञानेश्वर · वारकरी

मराठी

मी रिगालों असें भूतळीं । म्हणौनि समुद्र महाजळीं । हे पांसूचि ढेंपुळी । विरेचिना ॥ ४०१ ॥ आणी भूतेंही चराचरें । हे धरितसे जियें अपारें । तियें मीचि धरी धरे । रिगोनियां ॥ ४०२ ॥ गगनीं मी पंडुसुता । चंद्राचेनि मिसें अमृता । भरला जालों चालता । सरोवरु ॥ ४०३ ॥ तेथूनि फांकती रश्मिकर । ते पाट पेलूनि अपार । सर्वौषधींचे आगर । भरित असें मी ॥ ४०४ ॥ ऐसेनि सस्यादिकां सकळां । करी धान्यजाती सुकाळा । दें अन्नद्वारां जिव्हाळा । भूतजातां ॥ ४०५ ॥ आणि निपजविलें अन्न । तरी तैसें कैचें दीपन । जेणें जिरूनि समाधान । भोगिती जीव ॥ ४०६ ॥

श्री ज्ञानेश्वर का चित्र

श्री ज्ञानेश्वर · वारकरी

अंग्रेज़ी

13 *“Permeating the Earth I sustain the beings through My vital-force. I also nourish the herbs all, by becoming Soma, whose essence is the sap.”* (401)

I permeate the earth; therefore even though (it be) like a lump of particles, it is not dissolved in the water of the ocean. I permeate the earth and enable it to sustain the countless beings that are apparently sustained by the earth. I am, Oh Son of Pāndu, the vast moving lake full of nectar in the form of the Moon. I nourish all the herbs, and medicinal plants, by providing them with water in the form of lunar rays through the channels from the Moon-lake. Similarly, I nourish all kinds of grain (crops) making them abundant and thus protect all beings by providing them with food. Even though food is produced, will it suffice if (it is) not supplemented by the fire of hunger that brings about digestion and makes the beings enjoy satisfaction?

स्वामी रामसुखदास · आधुनिक

अंग्रेज़ी

'Gāmāviśya ca bhūtāni dhārayāmyahamojasā'—The Lord, permeating the earth, supports all beings moving and unmoving. It means, that the movable as well as immovable beings, are supported not by the power of the earth, but by the power of God.*

Scientists also agree, that on this globe, water level is higher than the land, and there is much more water, than land†, yet the earth does not submerge. It is because of the Lord's supporting power, that the earth does not submerge. The production power, as well as the attraction power, of the earth should also be regarded as God's.

'Puṣṇāmi cauṣadhiḥ sarvāḥ somo bhūtvā rasātmakaḥ'—The moon, has two kinds of power—the illuminating and the nourishing. Having described the illuminating power, in the preceding verse, here He describes, its nourishing power, He

* All—the heaven, the sun, the moon, the sky with stars, the ten directions, the earth and the ocean are supported by the power of God (Mahābhārata, Anu. 149/134).

He Who, having resided the earth, controls it but is not known by the earth; He Who is declared by the verse of the Vedas as the embodiment of purity, the Lord, the controller, the Destination and the Deity of the universe, Who is said to offer salvation to men and sages—that Lord Kṛṣṇa Candra, the Master of the entire universe, the affectionate of those who seek refuge in Him, be the subject of my eyes.

† On this globe (earth) water occupies seventy-one percent part while the land occupies only twenty-nine percent part.

declares, that it is He, Who through the medium of the moon, nourishes all plants.

The moon, in the bright half of the lunar month nourishes vegetation, while in the dark half it withers it. In the bright half, the sweet rays of the moon, nourish all herbs and plants, by infusing sap into them. A child in the womb of its mother, also grows in the bright half of a lunar month.

Here the term 'Somaḥ', stands for the 'Candraloka' (the lunar world), rather than only the moon. The moon, has not only the illuminating power, but also the power to create nectar. Nectar first comes to the moon from the lunar world, and then it comes to the earth, from the moon.

Here the term 'Auṣadhīḥ' stands for different kinds of corn, such as wheat and gram etc. The moon nourishes all herbs, plants and vegetables. All beings, such as men, birds and beasts etc., are nourished by the corn, nourished by the moon. That nourishing power of the moon, is in fact of God, rather than its own. The moon is merely an instrument on His hands.

**Appendix**—The earth and the moon etc.,—all is the Lord's lower nature (Gītā 7/4). Therefore only God is its supporter, producer, sustainer, protector and illuminator etc.,—all. Aparā Prakṛti (lower nature) being the power of God, is inseparable with Him.

Here the term 'Soma' stands for 'Candraloka' (the lunar world) which is above the Sun.*

*Link:—Having explained how He is the source of energy of the cosmic life, in the preceding verse, in the next verse, He explains how He digests food, through the gastric fire.*

*na viduḥ soma te māyām ye ca nakṣatrayonayaḥ

(Padmapurāṇa, Śrīti. 41/128)

यह श्लोक साझा करें

अभ्यास दीया: lit

नियमित पढ़ रहे हैं?

दैनिक अभ्यास शुरू करें — मुक्त, बिना खाते के।

आरंभ करें