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Guṇatraya Vibhāga Yoga
गुणत्रय विभाग योग · अध्याय 14:
कर्म
भक्ति
ज्ञान
आज की लय
सुनें · 14.13–14.17
सस्वर पाठ
पढ़ें · 14.13–14.17
5 श्लोक · अनुवाद
मनन
इस समय कौन-सा भाव मुझे चला रहा है — और क्या मैं उसे बस देख भर सकता हूँ?
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन
॥ १४.१३ ॥
हे अर्जुन! तमोगुण के बढ़ने पर अन्तःकरण और इन्द्रियों में अप्रकाश, कर्तव्य-कर्मों में अप्रवृत्ति और प्रमाद अर्थात् व्यर्थ चेष्टा और निद्रादि अन्तःकरण की मोहिनी वृत्तियाँ—ये सब ही उत्पन्न होते हैं।
अनुवाद
आज पूरा करने से आपका दीया जलता है