दिन 87 / 126
Bhakti Yoga
भक्ति योग · अध्याय 12:
कर्म
भक्ति
ज्ञान
आज की लय
सुनें · 12.11–12.15
सस्वर पाठ
पढ़ें · 12.11–12.15
5 श्लोक · अनुवाद
मनन
ऐसा क्या है जिससे मैं इतना प्रेम करता हूँ कि बार-बार उसी की ओर लौट आता हूँ?
अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्
॥ १२.११ ॥
यदि मेरी प्राप्ति रूप योग के आश्रित होकर उपर्युक्त साधन को करने में भी तू असमर्थ है तो मन-बुद्धि आदि पर विजय प्राप्त करने वाला होकर सब कर्मों के फल का त्याग कर।
अनुवाद
आज पूरा करने से आपका दीया जलता है