दिन 86 / 126
Bhakti Yoga
भक्ति योग · अध्याय 12:
कर्म
भक्ति
ज्ञान
आज की लय
सुनें · 12.6–12.10
सस्वर पाठ
पढ़ें · 12.6–12.10
5 श्लोक · अनुवाद
मनन
ऐसा क्या है जिससे मैं इतना प्रेम करता हूँ कि बार-बार उसी की ओर लौट आता हूँ?
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते
॥ १२.६ ॥
परन्तु जो मेरे परायण रहने वाले भक्तजन सम्पूर्ण कर्मों को मुझ में अर्पण करके मुझ सगुण रूप परमेश्वर को ही अनन्य भक्ति योग से निरन्तर चिन्तन करते हुए भजते हैं।
अनुवाद
आज पूरा करने से आपका दीया जलता है