दिन 84 / 126
Viśvarūpa Darśana Yoga
विश्वरूप दर्शन योग · अध्याय 11:
कर्म
भक्ति
ज्ञान
आज की लय
सुनें · 11.51–11.55
सस्वर पाठ
पढ़ें · 11.51–11.55
5 श्लोक · अनुवाद
मनन
ऐसा क्या है जो मेरे समेटने से परे है — और क्या मैं उसे विशाल ही रहने दे सकता हूँ?
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तवसौम्यं जनार्दन
इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः
॥ ११.५१ ॥
अर्जुन बोले—हे जनार्दन! आपके इस अति शान्त मनुष्य रूप को देखकर अब मैं स्थिरचित्त हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थिति को प्राप्त हो गया हूँ।
अनुवाद
आज पूरा करने से आपका दीया जलता है