दिन 83 / 126

Viśvarūpa Darśana Yoga

विश्वरूप दर्शन योग · अध्याय 11:

आज की लय

सुनें · 11.46–11.50
सस्वर पाठ
▶
पढ़ें · 11.46–11.50
5 श्लोक · अनुवाद
→
मनन

ऐसा क्या है जो मेरे समेटने से परे है — और क्या मैं उसे विशाल ही रहने दे सकता हूँ?

किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त

मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव

तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन

सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते

॥ ११.४६ ॥

मैं वैसे ही आपको मुकुट धारण किये हुए तथा गदा और चक्र हाथ में लिये हुए देखना चाहता हूँ, इसलिये हे विश्व स्वरूप! हे सहस्रबाहो! आप उसी चतुर्भुज रूप से प्रकट होइये।

अनुवाद

आज पूरा करने से आपका दीया जलता है