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Viśvarūpa Darśana Yoga
विश्वरूप दर्शन योग · अध्याय 11:
कर्म
भक्ति
ज्ञान
आज की लय
सुनें · 11.41–11.45
सस्वर पाठ
पढ़ें · 11.41–11.45
5 श्लोक · अनुवाद
मनन
ऐसा क्या है जो मेरे समेटने से परे है — और क्या मैं उसे विशाल ही रहने दे सकता हूँ?
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं
हे कृष्ण हे यादव हे सखेति
अजानता महिमानं तवेदं
मया प्रमादात्प्रणयेन वापि
॥ ११.४१ ॥
आपके इस प्रभाव को न जानते हुए, आप मेरे सखा हैं ऐसा मानकर प्रेम से अथवा प्रमाद से भी मैंने 'हे कृष्ण!', 'हे यादव!', 'हे सखे!' इस प्रकार जो कुछ बिना सोचे-समझे हटातू कहा है; और हे अच्युत! आप जो मेरे द्वारा विनोद के लिये विहार, शय्या, आसन और भोजनादि में अकेले अथवा उन सखाओं के सामने भी अपमानित किये गये हैं— वह सब अपराध अप्रमेय स्वरूप अर्थात् अचिन्त्य प्रभाव वाले आपसे मैं क्षमा करवाता हूँ।
श्लोक 41–42
अनुवाद
आज पूरा करने से आपका दीया जलता है