दिन 79 / 126
Viśvarūpa Darśana Yoga
विश्वरूप दर्शन योग · अध्याय 11:
कर्म
भक्ति
ज्ञान
आज की लय
सुनें · 11.25–11.30
सस्वर पाठ
पढ़ें · 11.25–11.30
6 श्लोक · अनुवाद
मनन
ऐसा क्या है जो मेरे समेटने से परे है — और क्या मैं उसे विशाल ही रहने दे सकता हूँ?
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि
दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि
दिशो न जाने न लभे च शर्म
प्रसीद देवेश जगन्निवास
॥ ११.२५ ॥
दाढ़ों के कारण विकराल और प्रलयकालकी अग्नि के समान प्रज्वलित आपके मुखों को देखकर मैं दिशाओं को नहीं जानता हूँ और सुख भी नहीं पाता हूँ। इसलिये हे देवेश! हे जगन्निवास! आप प्रसन्न हों।
अनुवाद
आज पूरा करने से आपका दीया जलता है