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Viśvarūpa Darśana Yoga

विश्वरूप दर्शन योग · अध्याय 11:

आज की लय

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6 श्लोक · अनुवाद
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मनन

ऐसा क्या है जो मेरे समेटने से परे है — और क्या मैं उसे विशाल ही रहने दे सकता हूँ?

अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य

मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्

पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रम्

स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्

॥ ११.१९ ॥

आपको आदि, अन्त और मध्य से रहित, अनन्त सामर्थ्य से युक्त, अनन्त भुजावाले, चन्द्र-सूर्यरूप नेत्रों वाले, प्रज्वलित अग्नि रूप मुखवाले और अपने तेज से इस जगत् को संतप्त करते हुए देखता हूँ।

अनुवाद

आज पूरा करने से आपका दीया जलता है