दिन 78 / 126
Viśvarūpa Darśana Yoga
विश्वरूप दर्शन योग · अध्याय 11:
कर्म
भक्ति
ज्ञान
आज की लय
सुनें · 11.19–11.24
सस्वर पाठ
पढ़ें · 11.19–11.24
6 श्लोक · अनुवाद
मनन
ऐसा क्या है जो मेरे समेटने से परे है — और क्या मैं उसे विशाल ही रहने दे सकता हूँ?
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य
मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रम्
स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्
॥ ११.१९ ॥
आपको आदि, अन्त और मध्य से रहित, अनन्त सामर्थ्य से युक्त, अनन्त भुजावाले, चन्द्र-सूर्यरूप नेत्रों वाले, प्रज्वलित अग्नि रूप मुखवाले और अपने तेज से इस जगत् को संतप्त करते हुए देखता हूँ।
अनुवाद
आज पूरा करने से आपका दीया जलता है