दिन 77 / 126
Viśvarūpa Darśana Yoga
विश्वरूप दर्शन योग · अध्याय 11:
कर्म
भक्ति
ज्ञान
आज की लय
सुनें · 11.13–11.18
सस्वर पाठ
पढ़ें · 11.13–11.18
6 श्लोक · अनुवाद
मनन
ऐसा क्या है जो मेरे समेटने से परे है — और क्या मैं उसे विशाल ही रहने दे सकता हूँ?
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा
॥ ११.१३ ॥
पाण्डु पुत्र अर्जुन ने उस समय अनेक प्रकार से विभक्त अर्थात् पृथक्-पृथक् सम्पूर्ण जगत् को देवों के देव श्रीकृष्ण भगवान् के उस शरीर में एक जगह स्थित देखा।
अनुवाद
आज पूरा करने से आपका दीया जलता है