दिन 73 / 126

Vibhūti Yoga

विभूति योग · अध्याय 10:

आज की लय

सुनें · 10.33–10.37
सस्वर पाठ
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पढ़ें · 10.33–10.37
5 श्लोक · अनुवाद
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मनन

इस साधारण दिन में कहाँ मैं किसी शान्त आभा को देख सकता हूँ?

अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च

अहमेवाक्षयः कालो धाताऽहं विश्वतोमुखः

॥ १०.३३ ॥

मैं अक्षरों में अकार हूँ और समासों में द्वन्द्वनामक समास हूँ। अक्षय काल अर्थात् काल का भी महाकाल तथा सब ओर मुखवाला, विराट् स्वरूप, सबका धारण-पोषण करने वाला भी मैं ही हूँ।

अनुवाद

आज पूरा करने से आपका दीया जलता है