दिन 72 / 126

Vibhūti Yoga

विभूति योग · अध्याय 10:

आज की लय

सुनें · 10.28–10.32
सस्वर पाठ
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पढ़ें · 10.28–10.32
5 श्लोक · अनुवाद
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मनन

इस साधारण दिन में कहाँ मैं किसी शान्त आभा को देख सकता हूँ?

आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्

प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः

॥ १०.२८ ॥

मैं शस्त्रों में वज्र और गौओं में कामधेनु हूँ। शास्त्रोक्त रीति से सन्तान की उत्पत्ति का हेतु कामदेव हूँ, और सर्पों में सर्पराज वासुकि हूँ।

अनुवाद

आज पूरा करने से आपका दीया जलता है