दिन 70 / 126

Vibhūti Yoga

विभूति योग · अध्याय 10:

आज की लय

सुनें · 10.18–10.22
सस्वर पाठ
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पढ़ें · 10.18–10.22
5 श्लोक · अनुवाद
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मनन

इस साधारण दिन में कहाँ मैं किसी शान्त आभा को देख सकता हूँ?

विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन

भूयः कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्

॥ १०.१८ ॥

हे जनार्दन! अपनी योग शक्ति को और विभूति को फिर भी विस्तारपूर्वक कहिये, क्योंकि आपके अमृतमय वचनों को सुनते हुए मेरी तृप्ति नहीं होती अर्थात् सुनने की उत्कण्ठा बनी ही रहती है।

अनुवाद

आज पूरा करने से आपका दीया जलता है