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Rāja Vidyā Rāja Guhya Yoga
राज विद्या राज गुह्य योग · अध्याय 9:
कर्म
भक्ति
ज्ञान
आज की लय
सुनें · 9.30–9.34
सस्वर पाठ
पढ़ें · 9.30–9.34
5 श्लोक · अनुवाद
मनन
आज मैं कौन-सी छोटी-सी वस्तु सच्चे मन से अर्पित कर सकता हूँ?
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः
॥ ९.३० ॥
यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भक्त होकर मुझको भजता है तो वह साधु ही मानने योग्य है; क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है। अर्थात् उसने भलीभाँति निश्चय कर लिया है कि परमेश्वर भजन के समान अन्य कुछ भी नहीं है।
अनुवाद
आज पूरा करने से आपका दीया जलता है