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Rāja Vidyā Rāja Guhya Yoga

राज विद्या राज गुह्य योग · अध्याय 9:

आज की लय

सुनें · 9.19–9.24
सस्वर पाठ
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6 श्लोक · अनुवाद
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मनन

आज मैं कौन-सी छोटी-सी वस्तु सच्चे मन से अर्पित कर सकता हूँ?

तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च

अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन

॥ ९.१९ ॥

मैं ही सूर्य रूप से तपता हूँ, वर्षा का आकर्षण करता हूँ और उसे बरसाता हूँ। हे अर्जुन! मैं ही अमृत और मृत्यु हूँ और सत्-असत् भी मैं ही हूँ।

अनुवाद

आज पूरा करने से आपका दीया जलता है