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Rāja Vidyā Rāja Guhya Yoga

राज विद्या राज गुह्य योग · अध्याय 9:

आज की लय

सुनें · 9.13–9.18
सस्वर पाठ
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पढ़ें · 9.13–9.18
6 श्लोक · अनुवाद
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मनन

आज मैं कौन-सी छोटी-सी वस्तु सच्चे मन से अर्पित कर सकता हूँ?

महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः

भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्

॥ ९.१३ ॥

परंतु हे कुन्ती पुत्र! दैवी प्रकृति के आश्रित महात्मा जन मुझ को सब भूतों का सनातन कारण और नाशरहित अक्षर स्वरूप जानकर अनन्य मन से युक्त होकर निरन्तर भजते हैं।

अनुवाद

आज पूरा करने से आपका दीया जलता है