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Rāja Vidyā Rāja Guhya Yoga
राज विद्या राज गुह्य योग · अध्याय 9:
कर्म
भक्ति
ज्ञान
आज की लय
सुनें · 9.7–9.12
सस्वर पाठ
पढ़ें · 9.7–9.12
6 श्लोक · अनुवाद
मनन
आज मैं कौन-सी छोटी-सी वस्तु सच्चे मन से अर्पित कर सकता हूँ?
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्
॥ ९.७ ॥
हे अर्जुन! कल्पों के अन्त में सब भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं अर्थात् प्रकृति में लीन होते हैं और कल्पों के आदि में उनको मैं फिर रचता हूँ।
अनुवाद
आज पूरा करने से आपका दीया जलता है