दिन 52 / 126
Jñāna Vijñāna Yoga
ज्ञान विज्ञान योग · अध्याय 7:
कर्म
भक्ति
ज्ञान
आज की लय
सुनें · 7.7–7.12
सस्वर पाठ
पढ़ें · 7.7–7.12
6 श्लोक · अनुवाद
मनन
ऐसा क्या है जिसे मैं शब्दों में समझता हूँ, पर अब तक जिया नहीं?
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव
॥ ७.७ ॥
हे धनञ्जय! मुझसे भिन्न दूसरा कोई भी परम कारण नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत् सूत्र में सूत्र के मणियों के सदृश मेरे में गुँथा हुआ है।
अनुवाद
आज पूरा करने से आपका दीया जलता है