दिन 50 / 126
Dhyāna Yoga
ध्यान योग · अध्याय 6:
कर्म
भक्ति
ज्ञान
आज की लय
सुनें · 6.43–6.47
सस्वर पाठ
पढ़ें · 6.43–6.47
5 श्लोक · अनुवाद
मनन
जब मन भटक जाता है, तब मैं उसे कितनी कोमलता से वापस ले आ सकता हूँ?
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन
॥ ६.४३ ॥
वहाँ उस पहले शरीर में संग्रह किये हुए बुद्धि-संयोग को अर्थात् समबुद्धि रूप योग के संस्कारों को अनायास ही प्राप्त हो जाता है और हे कुरुनन्दन! उसके प्रभाव से वह फिर परमात्मा की प्राप्ति रूप सिद्धि के लिये पहले से भी बढ़कर प्रयत्न करता है।
अनुवाद
आज पूरा करने से आपका दीया जलता है