दिन 47 / 126
Dhyāna Yoga
ध्यान योग · अध्याय 6:
कर्म
भक्ति
ज्ञान
आज की लय
सुनें · 6.25–6.30
सस्वर पाठ
पढ़ें · 6.25–6.30
6 श्लोक · अनुवाद
मनन
जब मन भटक जाता है, तब मैं उसे कितनी कोमलता से वापस ले आ सकता हूँ?
शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्
॥ ६.२५ ॥
क्रम-क्रम से अभ्यास करता हुआ उपरति को प्राप्त हो तथा धैर्य युक्त बुद्धि के द्वारा मन को परमात्मा में स्थित करके परमात्मा के सिवा और कुछ भी चिन्तन न करे।
अनुवाद
आज पूरा करने से आपका दीया जलता है