दिन 44 / 126
Dhyāna Yoga
ध्यान योग · अध्याय 6:
कर्म
भक्ति
ज्ञान
आज की लय
सुनें · 6.7–6.12
सस्वर पाठ
पढ़ें · 6.7–6.12
6 श्लोक · अनुवाद
मनन
जब मन भटक जाता है, तब मैं उसे कितनी कोमलता से वापस ले आ सकता हूँ?
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः
॥ ६.७ ॥
सरदी-गरमी और सुख-दुःखादि में तथा मान और अपमान में जिसके अन्तःकरण की वृत्तियाँ भलीभाँति शान्त हैं, ऐसे स्वाधीन आत्मावाले पुरुष के ज्ञान में सच्चिदानन्दघन परमात्मा सम्यक् प्रकार से स्थित हैं अर्थात् उसके ज्ञान में परमात्मा के सिवा अन्य कुछ है ही नहीं।
अनुवाद
आज पूरा करने से आपका दीया जलता है