दिन 43 / 126
Dhyāna Yoga
ध्यान योग · अध्याय 6:
कर्म
भक्ति
ज्ञान
आज की लय
सुनें · 6.1–6.6
सस्वर पाठ
पढ़ें · 6.1–6.6
6 श्लोक · अनुवाद
मनन
जब मन भटक जाता है, तब मैं उसे कितनी कोमलता से वापस ले आ सकता हूँ?
श्री भगवानुवाच
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः
॥ ६.१ ॥
श्रीभगवान् बोले— जो पुरुष कर्म फल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्म करता है, वह संन्यासी तथा योगी है; और केवल अग्नि का त्याग करने वाला संन्यासी नहीं है तथा केवल क्रियाओं का त्याग करने वाला योगी नहीं है।
अनुवाद
आज पूरा करने से आपका दीया जलता है