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Karma Sannyāsa Yoga

कर्म सन्न्यास योग · अध्याय 5:

आज की लय

सुनें · 5.25–5.29
सस्वर पाठ
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पढ़ें · 5.25–5.29
5 श्लोक · अनुवाद
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मनन

क्या मैं शान्ति अपने कर्म से भागकर ढूँढ़ रहा हूँ, या उसी के भीतर?

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः

छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः

॥ ५.२५ ॥

जिनके सब पाप नष्ट हो गये हैं, जिनके सब संशय ज्ञान के द्वारा निवृत्त हो गये हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत हैं और जिनका जीता हुआ मन निश्चल भाव से परमात्मा में स्थित है, वे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शान्त ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।

अनुवाद

आज पूरा करने से आपका दीया जलता है