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Karma Sannyāsa Yoga

कर्म सन्न्यास योग · अध्याय 5:

आज की लय

सुनें · 5.13–5.18
सस्वर पाठ
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पढ़ें · 5.13–5.18
6 श्लोक · अनुवाद
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मनन

क्या मैं शान्ति अपने कर्म से भागकर ढूँढ़ रहा हूँ, या उसी के भीतर?

सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी

नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्

॥ ५.१३ ॥

अन्तःकरण जिसके वश में है, ऐसा सांख्ययोग का आचरण करने वाला पुरुष न करता हुआ और न करवाता हुआ ही नवद्वारों वाले शरीर रूप घर में सब कर्मों को मन से त्यागकर आनन्दपूर्वक सच्चिदानन्दघन परमात्मा के स्वरूप में स्थित रहता है।

अनुवाद

आज पूरा करने से आपका दीया जलता है