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Karma Sannyāsa Yoga

कर्म सन्न्यास योग · अध्याय 5:

आज की लय

सुनें · 5.7–5.12
सस्वर पाठ
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6 श्लोक · अनुवाद
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मनन

क्या मैं शान्ति अपने कर्म से भागकर ढूँढ़ रहा हूँ, या उसी के भीतर?

योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः

सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते

॥ ५.७ ॥

जिसका मन अपने वश में है, जो जितेन्द्रिय एवं विशुद्ध अन्तःकरण वाला है और सम्पूर्ण प्राणियों का आत्मरूप परमात्मा ही जिसका आत्मा है, ऐसा कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता।

अनुवाद

आज पूरा करने से आपका दीया जलता है