दिन 37 / 126
Jñāna Karma Sannyāsa Yoga
ज्ञान कर्म सन्न्यास योग · अध्याय 4:
कर्म
भक्ति
ज्ञान
आज की लय
सुनें · 4.38–4.42
सस्वर पाठ
पढ़ें · 4.38–4.42
5 श्लोक · अनुवाद
मनन
आज मैं ऐसा क्या कर सकता हूँ, जिसके परिणाम पर अपना अधिकार जताए बिना?
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति
॥ ४.३८ ॥
इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसंदेह कुछ भी नहीं है। उस ज्ञान को कितने ही काल से कर्मयोग के द्वारा शुद्धान्तःकरण हुआ मनुष्य अपने-आप ही आत्मामें पा लेता है।
अनुवाद
आज पूरा करने से आपका दीया जलता है