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Jñāna Karma Sannyāsa Yoga

ज्ञान कर्म सन्न्यास योग · अध्याय 4:

आज की लय

सुनें · 4.23–4.27
सस्वर पाठ
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पढ़ें · 4.23–4.27
5 श्लोक · अनुवाद
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मनन

आज मैं ऐसा क्या कर सकता हूँ, जिसके परिणाम पर अपना अधिकार जताए बिना?

गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः

यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते

॥ ४.२३ ॥

जिसकी आसक्ति सर्वथा नष्ट हो गयी है, जो देहाभिमान और ममता से रहित हो गया है, जिसका चित्त निरन्तर परमात्मा के ज्ञान में स्थित रहता है—ऐसे केवल यज्ञ सम्पादन के लिये कर्म करने वाले मनुष्य के सम्पूर्ण कर्म भलीभाँति विलीन हो जाते हैं।

अनुवाद

आज पूरा करने से आपका दीया जलता है