दिन 32 / 126
Jñāna Karma Sannyāsa Yoga
ज्ञान कर्म सन्न्यास योग · अध्याय 4:
कर्म
भक्ति
ज्ञान
आज की लय
सुनें · 4.13–4.17
सस्वर पाठ
पढ़ें · 4.13–4.17
5 श्लोक · अनुवाद
मनन
आज मैं ऐसा क्या कर सकता हूँ, जिसके परिणाम पर अपना अधिकार जताए बिना?
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्
॥ ४.१३ ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र -इन चार वर्णों का समूह, गुण और कर्मों के विभागपूर्वक मेरे द्वारा रचा गया है। इस प्रकार उस सृष्टि-रचनादि कर्म का कर्ता होने पर भी मुझ अविनाशी परमेश्वर को तू वास्तव में अकर्ता ही जान।
अनुवाद
आज पूरा करने से आपका दीया जलता है