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Jñāna Karma Sannyāsa Yoga

ज्ञान कर्म सन्न्यास योग · अध्याय 4:

आज की लय

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सस्वर पाठ
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मनन

आज मैं ऐसा क्या कर सकता हूँ, जिसके परिणाम पर अपना अधिकार जताए बिना?

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्

॥ ४.७ ॥

हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात् साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ।

अनुवाद

आज पूरा करने से आपका दीया जलता है