दिन 31 / 126
Jñāna Karma Sannyāsa Yoga
ज्ञान कर्म सन्न्यास योग · अध्याय 4:
कर्म
भक्ति
ज्ञान
आज की लय
सुनें · 4.7–4.12
सस्वर पाठ
पढ़ें · 4.7–4.12
6 श्लोक · अनुवाद
मनन
आज मैं ऐसा क्या कर सकता हूँ, जिसके परिणाम पर अपना अधिकार जताए बिना?
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्
॥ ४.७ ॥
हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात् साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ।
अनुवाद
आज पूरा करने से आपका दीया जलता है