दिन 29 / 126
Karma Yoga
कर्म योग · अध्याय 3:
कर्म
भक्ति
ज्ञान
आज की लय
सुनें · 3.39–3.43
सस्वर पाठ
पढ़ें · 3.39–3.43
5 श्लोक · अनुवाद
मनन
मैं कहाँ केवल फल के लिए ही कर्म कर रहा हूँ?
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च
॥ ३.३९ ॥
और हे अर्जुन! इस अग्नि के समान कभी न पूर्ण होने वाले कामरूप ज्ञानियों के नित्य वैरी के द्वारा मनुष्य का ज्ञान ढका हुआ है।
अनुवाद
आज पूरा करने से आपका दीया जलता है