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Karma Yoga

कर्म योग · अध्याय 3:

आज की लय

सुनें · 3.39–3.43
सस्वर पाठ
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पढ़ें · 3.39–3.43
5 श्लोक · अनुवाद
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मनन

मैं कहाँ केवल फल के लिए ही कर्म कर रहा हूँ?

आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा

कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च

॥ ३.३९ ॥

और हे अर्जुन! इस अग्नि के समान कभी न पूर्ण होने वाले कामरूप ज्ञानियों के नित्य वैरी के द्वारा मनुष्य का ज्ञान ढका हुआ है।

अनुवाद

आज पूरा करने से आपका दीया जलता है