दिन 28 / 126

Karma Yoga

कर्म योग · अध्याय 3:

आज की लय

सुनें · 3.34–3.38
सस्वर पाठ
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पढ़ें · 3.34–3.38
5 श्लोक · अनुवाद
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मनन

मैं कहाँ केवल फल के लिए ही कर्म कर रहा हूँ?

इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ

तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ

॥ ३.३४ ॥

इन्द्रिय-इन्द्रिय के अर्थ में अर्थात् प्रत्येक इन्द्रिय के विषय में राग और द्वेष छिपे हुए स्थित हैं, मनुष्य को उन दोनों के वश में नहीं होना चाहिये, क्योंकि वे दोनों ही इसके कल्याण मार्ग में विघ्न करने वाले महान् शत्रु हैं।

अनुवाद

आज पूरा करने से आपका दीया जलता है