दिन 27 / 126
Karma Yoga
कर्म योग · अध्याय 3:
कर्म
भक्ति
ज्ञान
आज की लय
सुनें · 3.29–3.33
सस्वर पाठ
पढ़ें · 3.29–3.33
5 श्लोक · अनुवाद
मनन
मैं कहाँ केवल फल के लिए ही कर्म कर रहा हूँ?
प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्
॥ ३.२९ ॥
प्रकृति के गुणों से अत्यन्त मोहित हुए मनुष्य गुणों में और कर्मों में आसक्त रहते हैं, उन पूर्णतया न समझने वाले मन्दबुद्धि अज्ञानियों को पूर्णतया जानने वाला ज्ञानी विचलित न करे।
अनुवाद
आज पूरा करने से आपका दीया जलता है