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Karma Yoga

कर्म योग · अध्याय 3:

आज की लय

सुनें · 3.29–3.33
सस्वर पाठ
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पढ़ें · 3.29–3.33
5 श्लोक · अनुवाद
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मनन

मैं कहाँ केवल फल के लिए ही कर्म कर रहा हूँ?

प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु

तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्

॥ ३.२९ ॥

प्रकृति के गुणों से अत्यन्त मोहित हुए मनुष्य गुणों में और कर्मों में आसक्त रहते हैं, उन पूर्णतया न समझने वाले मन्दबुद्धि अज्ञानियों को पूर्णतया जानने वाला ज्ञानी विचलित न करे।

अनुवाद

आज पूरा करने से आपका दीया जलता है