दिन 23 / 126
Karma Yoga
कर्म योग · अध्याय 3:
कर्म
भक्ति
ज्ञान
आज की लय
सुनें · 3.7–3.12
सस्वर पाठ
पढ़ें · 3.7–3.12
6 श्लोक · अनुवाद
मनन
मैं कहाँ केवल फल के लिए ही कर्म कर रहा हूँ?
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते
॥ ३.७ ॥
किंतु हे अर्जुन! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है।
अनुवाद
आज पूरा करने से आपका दीया जलता है