दिन 21 / 126
Sāṅkhya Yoga
साङ्ख्य योग · अध्याय 2:
कर्म
भक्ति
ज्ञान
आज की लय
सुनें · 2.68–2.72
सस्वर पाठ
पढ़ें · 2.68–2.72
5 श्लोक · अनुवाद
मनन
मैं कहाँ उस वस्तु के लिए शोक कर रहा हूँ जो कभी नष्ट नहीं होती?
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता
॥ २.६८ ॥
इसलिये हे महाबाहो! जिस पुरुष की इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों से सब प्रकार निग्रह की हुई हैं, उसी की बुद्धि स्थिर है।
अनुवाद
आज पूरा करने से आपका दीया जलता है