दिन 20 / 126

Sāṅkhya Yoga

साङ्ख्य योग · अध्याय 2:

आज की लय

सुनें · 2.63–2.67
सस्वर पाठ
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5 श्लोक · अनुवाद
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मनन

मैं कहाँ उस वस्तु के लिए शोक कर रहा हूँ जो कभी नष्ट नहीं होती?

क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः

स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति

॥ २.६३ ॥

क्रोध से अत्यन्त मूढ़भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात् ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है।

अनुवाद

आज पूरा करने से आपका दीया जलता है