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Sāṅkhya Yoga

साङ्ख्य योग · अध्याय 2:

आज की लय

सुनें · 2.48–2.52
सस्वर पाठ
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पढ़ें · 2.48–2.52
5 श्लोक · अनुवाद
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मनन

मैं कहाँ उस वस्तु के लिए शोक कर रहा हूँ जो कभी नष्ट नहीं होती?

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय

सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते

॥ २.४८ ॥

हे धनञ्जय! तू आसक्ति को त्याग कर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धिवाला होकर योग में स्थित हुआ कर्तव्य कर्मों को कर, समत्व ही योग कहलाता है।

अनुवाद

आज पूरा करने से आपका दीया जलता है