दिन 15 / 126
Sāṅkhya Yoga
साङ्ख्य योग · अध्याय 2:
कर्म
भक्ति
ज्ञान
आज की लय
सुनें · 2.37–2.42
सस्वर पाठ
पढ़ें · 2.37–2.42
6 श्लोक · अनुवाद
मनन
मैं कहाँ उस वस्तु के लिए शोक कर रहा हूँ जो कभी नष्ट नहीं होती?
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः
॥ २.३७ ॥
या तो तू युद्ध में मारा जाकर स्वर्ग को प्राप्त होगा अथवा संग्राम में जीतकर पृथ्वी का राज्य भोगेगा। इस कारण हे अर्जुन! तू युद्ध के लिये निश्चय करके खड़ा हो जा।
अनुवाद
आज पूरा करने से आपका दीया जलता है