दिन 14 / 126

Sāṅkhya Yoga

साङ्ख्य योग · अध्याय 2:

आज की लय

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सस्वर पाठ
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6 श्लोक · अनुवाद
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मनन

मैं कहाँ उस वस्तु के लिए शोक कर रहा हूँ जो कभी नष्ट नहीं होती?

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि

धर्म्याद्धि युद्धाछ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते

॥ २.३१ ॥

तथा अपने धर्म को देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है यानी तुझे भय नहीं करना चाहिये; क्योंकि क्षत्रिय के लिये धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है।

अनुवाद

आज पूरा करने से आपका दीया जलता है