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Sāṅkhya Yoga

साङ्ख्य योग · अध्याय 2:

आज की लय

सुनें · 2.25–2.30
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6 श्लोक · अनुवाद
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मनन

मैं कहाँ उस वस्तु के लिए शोक कर रहा हूँ जो कभी नष्ट नहीं होती?

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते

तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि

॥ २.२५ ॥

यह आत्मा अव्यक्त है, यह आत्मा अचिन्त्य है और यह आत्मा विकाररहित कहा जाता है। इससे हे अर्जुन! इस आत्मा को उपर्युक्त प्रकार से जानकर तू शोक करने के योग्य नहीं है अर्थात् तुझे शोक करना उचित नहीं है।

अनुवाद

आज पूरा करने से आपका दीया जलता है